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Showing posts from November, 2015

खिला ताज़ा गुलाब जैसे

खिला ताज़ा गुलाब  जैसे तुमसे मिलके  लगा ऐसे है लफ़्ज़े मुहब्बत ज़ुबाँ पे मगर तुमसे कह दूँ कैसे? तुमसे मिलने के पहले,, जाने लोग मिले कैसे -२ अजनबी शहर में, सिर्फ  तुम हमे लगे अपने जैसे मुकेश इलाहाबादी -----

या तो दर्द की दवा दे

या  तो दर्द की दवा दे वरना  ज़हर ही ला दे मुझे नींद आ जाएगी कोई तो लोरी सुना दे बादल हो बरस जाओ थोड़ी तो प्यास बुझा दे या ख़ुदा अब तो मुझे मेरे प्यार से मिला दे रोज़ -२ याद आऊं मै इससे बेहतर भुला दे किताबे ज़ीस्त से  ही तू  मेरा नाम मिटा दे आज बहुत रोया हूँ मै मुकेश तू आके हंसा दे मुकेश इलाहाबादी ---

नियाग्रा फाल बरसता हो जैसे

जब तुम हंसती हो दशों दिशाओं से इंद्रधनुषी झरने हज़ार हज़ार तरीके से नियाग्रा फाल बरसता हो जैसे तब, सूखी चट्टानों सा मेरा वज़ूद तब्दील हो जाता है एक हरी भरी घाटी में जिसमे तुम्हारी हंसी प्रतिध्वनित होती है और मै, सराबोर हो जाता हूँ रूहानी नाद से जैसे कोई योगी नहा लेता है ध्यान में उतर के अनाहत नाद की मंदाकनी में मुकेश इलाहाबादी ----

चुम्बक

मेरे लहू में लोहा है, जो तुम्हरी आँखों के चुम्बक से खींचा आता है और तुमसे जुड़ जाना चाहता है हमेशा हमेशा के लिए जब तक कि मेरे लहू में लोहा है और तुम्हारी आँखों में चुम्बक मुकेश इलाहाबादी -----------

अपनी खामोशी में सुनता हूँ

सुमी , तुम मानो या न मानो  पर अक्शर मै,  तुम्हे, अपनी खामोशी में सुनता हूँ  आहिस्ता - आहिस्ता  जैसे नदी सुनती है  हवा का बहना, आहिस्ता - आहिस्ता  या की नदी के पाल सुनते हैं  लहरों का बहना आहिस्ता आहिस्ता  या कि कोई बच्चा  सुनता है माँ की लोरियाँ  आहिस्ता आहिस्ता  और फिर सो जाता है  रोते - रोते  और फिर सपने में मुस्कुराता है  कोई खूबसूरत सपना देख के  जिसमे होती है  कहानी की खूबसूरत राजकुमारी  जिसे वो ले कर उड़ रहा होता है  बादलों में - आहिस्ता आहिस्ता  बस ऐसे ही  तुम्हे याद करता हूँ  और सुनता हूँ तुम्हारी हंसी  जैसे बंज़र खेत सुनते हैं   बादलों की बरसती बूंदों को  बस कुछ  ऐसे ही  तुम बरसती हो  मुझमे आहिस्ता आहिस्ता  मुकेश इलाहाबादी ------------

तेरे प्यार का ही असर है

तेरे  प्यार का ही असर है  मुझे नहीं,अपनी खबर है  तू राहे ज़िंदगी में छाँह थी  तुझ बिन धूप का सफर है   अब कोई सुर सधता नहीं    ज़िदंगी ग़ज़ल बे - बहर है  किससे पूछू मै पता तेरा  ये शहर अजनबी शहर है  थोड़ा संभल - संभल चल  प्यार इक कठिन डगर है  मुकेश इलाहाबादी --------

कुछ भी तो, नहीं बदला है

कुछ भी तो, नहीं बदला है वही सुबह वही शाम वही मुंडेर पे चहकती चिड़िया है हवा की लय पे ठुमकते वही पेड़ों की शाखें यहां तक कि वही कमरा वही दीवारें वही तन्हाई वही सब कुछ वहीं सब कुछ फिर क्यूँ लगता है सब कुछ बदल गया है तुम्हारे जाने के बाद ? मुकेश इलाहाबादी ---

YARA O DILDARA LAGTA HAI

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हमने, घर बाँट लिया

हमने, घर बाँट लिया दूकान बाँट ली ज़मीन बाँट ली यहाँ तक कि समंदर भी बहुत हद तक बाँट लिया , बस, इक आसमान भर बाकी है मुकेश इलाहाबादी ----------

रात चांदनी बरसती रही

रात  चांदनी बरसती  रही  रातरानी भी महकती रही  वो आग जो बुझ चुकी थी  अलाव बन,सुलगती  रही  बिन आब की मछली  सा  रह -२वह भी तड़पती रही  रात इक तूफ़ान भी उट्ठा  और बिजली कड़कती रही  मुकेश मै और क्या बताऊँ मुझपे क्या -२ बीतती रही  मुकेश इलाहबदी ---------

यारा ओ दिलदारा लगता है

यारा ओ दिलदारा लगता है  तू  मुझको प्यारा  लगता है  है संग तेरे,  दुनिया ज़न्नत   वर्ना संसार अधूरा लगता है  अज़नबियों के इस शहर में  सिर्फ तू ही अपना लगता है  जब बात करे है खट मिट्ठी  तू कच्चा अमिया लगता है   कच्चे दूध सी  उज्वल हँसी  सच तू बेहद सोणा लगता है  मुकेश इलाहाबादी ---------

तुम, इंकार के जितने भी बहाने जानती हो

तुम,  इंकार के जितने भी बहाने जानती हो , उससे ज़्यादा  मै प्यार के तरीके जानता हूँ  मुकेश इलाहाबादी -----

दिल तो मेरा भी कई बार किया था

सुमी, दिल तो मेरा भी कई बार किया था खरीदूं चमेली के फूलों से गुंथी वेणी सजाऊँ, तुम्हारे बालों में और फिर महक जाऊं तुम्हारे साथ मै  भी खैर,, छोड़ो  ये बताओ तुम कैसी हो ?? उम्मीद है ठीक ही होगी फिलहाल मै  भी ठीक ही हूँ अपनी तन्हाई में अपनी खामोशी में अपने आप में, मुकेश इलाहाबादी ----------

अँधेरे के ख़िलाफ़

अँधेरे के ख़िलाफ़ लड़ते हुए तलवार भांज - भांज कर अपने को या फिर अपनों को ज़ख़्मी करने से बेहतर होता सूरज का आवाहन करें और अगर ऐसा नही करते हैं देख लेना एक दिन हम अँधेरे से लड़ लड़ कर एक दिन अँधेरे में विलीन हो कर अंतहीन अँधेरे का हिस्सा हो जाएगे (तब हमारे हाथ में कुछ भी न होगा न तलवार भांजना और न सूरज लाना ) मुकेश इलाहाबादी -------------------------

जी तो बहुत चाहे है मुकेश, किसी का हो जाऊं

जी तो बहुत चाहे है मुकेश, किसी का हो जाऊं लफ़्ज़े वफ़ा है, कि किसी और का होने नहीं देता मुकेश इलाहाबादी -------------

आईना

आईना पोछ कर कई -कई ऐंगल से अपना चेहरा देखते हुए गुनगुना रही होती है कोई प्रेम गीत है तभी - अचानक माँ की आवाज़ सुन हड़बड़ाहट में आईना वही छोड़ भागती है माँ के पास उसकी टहल सुनने और,,  भूल जाती है 'प्रेम गीत' साड़ी के पल्लू से आईना साफ़ कर देखती है- अपना चेहरा लगाती है - ठीक माथे के बीचों बीच लाल गोल बिंदी और भँवरे से झूमते झुमके देख भूल जाती है दिन भर की थकन महंगाई और आमदनी में संतुलन बिठाने की ज़द्दो जहद और गुनगुनाने लगती है - प्रेम गीत मुकेश इलाहाबादी --------------------------   

सिर्फ , और सिर्फ धुँवा रह जाए इसके पहले

सारा आलम, धुँआ - धुँआ हो जाये इसके पहले बचा लेना चाहता हूँ थोड़ी से 'हवा' पारदर्शी और स्वच्छ जो बहुत ज़रूरी है स्वांस लेने के लिए ज़िंदा रहने के लिए इसी तरह, बचा लेना चाहता हूँ नदियों और पोखरों में थोड़ा ही सही, पर स्वछ जल थोड़ा सा आकाश (स्पेस) थोड़ी सी आग (बगैर धुँआ) मुकेश इलाहाबादी -------

एक सूनसान घाटी में

भुलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद लौट आती हैं तुम्हारी यादें मुझ तक हज़ारों हज़ार तरीके से शायद मै तब्दील हो चूका हूँ एक गहरे अंधे कुँए या फिर एक सूनसान घाटी में तुम्हारे जाने के बाद मुकेश इलाहाबादी ---------