खिला ताज़ा गुलाब जैसे
खिला ताज़ा गुलाब जैसे तुमसे मिलके लगा ऐसे है लफ़्ज़े मुहब्बत ज़ुबाँ पे मगर तुमसे कह दूँ कैसे? तुमसे मिलने के पहले,, जाने लोग मिले कैसे -२ अजनबी शहर में, सिर्फ तुम हमे लगे अपने जैसे मुकेश इलाहाबादी -----
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”