कुछ भी तो, नहीं बदला है

कुछ भी तो,
नहीं बदला है
वही सुबह
वही शाम
वही मुंडेर पे
चहकती चिड़िया है
हवा की लय पे
ठुमकते वही पेड़ों की शाखें
यहां तक कि
वही कमरा
वही दीवारें
वही तन्हाई
वही सब कुछ
वहीं सब कुछ
फिर क्यूँ लगता है
सब कुछ बदल गया है
तुम्हारे जाने के बाद ?

मुकेश इलाहाबादी ---

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