मेरी धड़कनों में छुपा है तुम्हारा असर,
हर ख़ामोशी में सुनता हूँ तुम्हारी ही ख़बर,
मैं ख़ुद से भी कम मिलता हूँ इन दिनों,
तुम मुझसे यूँ ही बेख़बर मत रहना मगर।
मुकेश ,,,,,,,,,
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मेरी धड़कनों में छुपा है तुम्हारा असर,
हर ख़ामोशी में सुनता हूँ तुम्हारी ही ख़बर,
मैं ख़ुद से भी कम मिलता हूँ इन दिनों,
तुम मुझसे यूँ ही बेख़बर मत रहना मगर।
मुकेश ,,,,,,,,,
रात की सीढ़ियों पर रख देता हूँ तुम्हारा नाम,
चाँद की पेशानी पर लिख देता हूँ पैग़ाम,
नींद मेरी हो न हो कोई बात नहीं,
तुम मेरी ख़्वाबों में आबाद रहना हर शाम।
मुकेश ,,,,,,,,,
हम एक नदी बचाएँगे
हम एक नदी बचाएँगे—
उसे नक़्शों में नहीं बाँधेंगे,
नीली रेखा बनाकर
फाइलों में नहीं रखेंगे।
हम उसे बहने देंगे
जैसे माँ अपने बाल खोलकर
हवा में छोड़ देती है।
हम उसके कंधों पर
बाँधों का बोझ नहीं रखेंगे,
उसकी कलाईयों में
लोहे की घड़ियाँ नहीं पहनाएँगे।
बस उसकी प्यास से
थोड़ा-सा जल लेंगे,
उसकी धारा से
दो मुट्ठी शांति।
हम उसके किनारे
महल नहीं उगाएँगे,
एक कच्चा घाट बनाएँगे—
जहाँ पाँव डुबोकर
दिन भर की धूल उतार सकें।
हम उसकी लहरों में
ज़हर नहीं घोलेंगे,
केवल अपने थके हुए शब्द
धीरे से छोड़ देंगे,
कि वे बहते-बहते
हल्के हो जाएँ।
साल में एक बार
हम उसके पास लौटेंगे
एक दीपक,
कुछ जंगली फूल,
और अपने भीतर बची हुई
थोड़ी-सी विनम्रता लेकर।
हम एक नदी बचाएँगे
ताकि वह हमें
मनुष्य बने रहने का
अर्थ सिखाती रहे।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,