दर्द और यादों के सिक्के उछालता हूँ
दर्द और यादों के सिक्के उछालता हूँ और रात तेरे ख्वाबों को खरीदता हूँ मेरी आँखों मे तुम्हारी नाम की झील है साँझ होते ही इसमे इकचाँद उतरता है तुम्हारी आँखो मे बातों मे मीठा नशा है क्या तुम्हारे वज़ूद से महुआ टपकता है सिर्फ मुझे और तुझे मालूम तू मेरी नहीं ज़माना मुझे तेरा तुझे मेरी समझता है जानता हूँ लौट के नहीं आयेगी फिर भी ये पागल दिल क्यूँ तेरा इंतजार करता है सावन की बारिस् मे सब कुछ भीगा भीगा ऐसे मे यादों का अलाव बहुत सुलगता है मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,,,,