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Showing posts from February, 2015

छत सिर्फ छत नही होती

छत सिर्फ चार दीवारों पे टिकी सिर पे टंगी सतह भर नही होती छत हमे रहने की सहूलियत देती है छत हमारे दुख दर्द को छुपाये रखने मे मदद देती है छत हमे देती है खुला आकाश ताजी हवा उगता और डूबता सूरज बरसात की फुहारें और, जाडे की नर्म धूप छत ही वो जगह है जहां खडे हो कर हम अपने आस पास को देख पाते हैं और अच्छी तरह से छत वो जगह होती हैं जो अक्सर रात कें अधेरे मे भीड़ से अलग  जाकर आसूं बहाने को जगह देती हैं छत वा जगह होती हैं जहां हम दुख में तारे गिन कर रात काट देते हैं छत ही अक्सर हमे अपने प्रेमी से मिलने की जगह और माहौल दिलाती हैं छत ही तो हैं जहां हम अपने कपडे सुखाते हैं और भीगे बाल छत ही हमें पतंगे उड़ने के लिए एक खूबसूरत जगह मुहैया कराती है छत प्रेम के फलने फूलने और बढ़ने का अवसर भी देती है छत ही तो वह जगह होती है जहां हम अक्सर अपने घर का कबाड रख आते हैं और भूल जाते हैं महीनो के लिये सालों के लिये फिर भी छत उस कबाड को अपने सीने पे लादे  रहती हैं सालों साल और हमसे कोई शिकायत नही करती छत ही तो हैं जो हमे तमाम आंधी तुफान से बचा कर रखती हैं और छते ही तो हैं जो हमे इज्ज्त आबरु देती हैं नही विस्...

दीवार सिर्फ दीवार होती है

चुपके से बात सुनना अषोभन होता है इसलिये कुछ लोग अपने कान उतारकर दीवार से चिपका देते हैं वर्ना, दीवार के कान कहां होते हैं ? दीवार के कान होता तो, मुॅह भी होता वर्ना वह बात सुनकर युंही खड़ी न रहती निर्विकार निषब्द दीवार सिर्फ दीवार होती है बाहर सह कर धूप पानी और बौछार रखती है खुद को अंदर से चिकनी और चमकदार ताकि हम रह सके शुकून और आराम से दीवार कभी इंसान नही बनती और न ही कभी उसने ख्वाहिश जाहिर की जब कि इन्सान बन जाता है दीवार और लगा लेता है कान जो कि अषोभन होता है दीवार सिर्फ दीवार होती है दीवारों के कान नहीं होते मुकेश इलाहाबादी -----------------

नकाब उसका उलट जाता तो

नकाब उसका उलट जाता तो एक और चॉद निकल आता तो मै मोम के पर ले कर उडा था धूपकी आंच से पिघल जाता तो मै कतरा के निकल आया वर्ना मुस्कुराके हाथ वह मिलाता तो अच्छा हुआ मै उससे नही मिला जख्म फिर से हरा हो जाता तो तुम फिर दरवाजा बंद कर लेते मुकेश गर मै लौट भी आता तो मुकेश इलाहाबादी .....................

प्यार ही प्यार करूँ

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प्यार  ही  प्यार  करूँ तुझसे  इक़रार  करूँ जब - जब  रूठो तुम मिन्नतें सौ बार करूँ हया  का परदा  हटा  नज़रें  तो  चार  करूँ ग़र बिछड़ूं तुझसे तो आखें अश्कबार करूँ तेरे सारे वायदे झूठे फिरभी ऐतबार करूँ मुकेश इलाहाबादी ---

वो पसे -दीवार बैठे हैं

वो पसे -दीवार बैठे हैं ग़म में डूबे यार बैठे हैं दौलत औ शोहरत के हज़ारों बीमार बैठे हैं आँख उठा के देखो तो सारे गुनहगार बैठे हैं तुम ही नहीं हो मियाँ सभी होशियार बैठे हैं महफ़िल में आओ तो तेरे तलबगार बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी --

अश्कों को बहने दो

अश्कों को बहने दो दर्द ऐ दिल सहने दो दिल क्या कहता है दिल की सुनने दो हम तन्हा ही अच्छे तनहा ही रहने दो फुहार बन बरसेंगे बदल बन घिरने दो मुकेश हमको भी कुछ तो कहने दो मुकेश इलाहाबादी --

वक़्त के साथ बदल रहे हैं

वक़्त के साथ बदल रहे हैं हम भी साँचे में ढल रहे हैं है आराम कहाँ  मयस्सर कि सुबो -शाम चल रहे हैं तुमसे मिल कर ऐ-दोस्त  मेरे अरमान मचल रहे हैं सहरा था ये दिले गुलशन गेंदा - गुलाब खिल रहे हैं तुम भी तो कुछ बोलो भी बहुत दिन बाद मिल रहे हैं मुकेश इलाहाबादी ----------

सावन की झड़ी सी

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सावन की झड़ी सी वो कुड़ी सांवली सी सूरत व सीरत में प्यारी सी भली सी बातें हैं उसकी जैसे मिस्री की डली सी रंगत उसकी जैसे जूही की कली सी अजनबी शहर में लगती अपनी सी मुकेश इलाहाबादी -

जान की बाजी हमने यूँ ही नहीं लगाई थी

जान की बाजी हमने यूँ ही नहीं लगाई थी हमें मालूम था दिल के सौदे सस्ते नहीं होते मुकेश इलाहाबादी ---------------------- --

सावन की झड़ी सी

सावन की झड़ी सी वो कुड़ी सांवली सी सूरत व सीरत में प्यारी सी भली सी बातें हैं उसकी जैसे मिस्री की डली सी रंगत उसकी जैसे जूही की कली सी अजनबी शहर में लगती अपनी सी मुकेश इलाहाबादी ---

पी कर बहके नही

पी कर बहके नही टूट के बिखरे नही रिश्ते निभाया कियेे चालाकी करते नही खुशियॉ मिली जब देर तक चहके नही अक्सरहॉ ग़म अपने किसी से कहते नही गजल में मुकेश हम बेवकूफी लिखते नही मुकेश इलाहाबादी .....

चलो आओ पुल बनाया जाए

चलो आओ पुल बनाया जाए दो किनारों को मिलाया जाए तुम वहाँ ग़मज़दा मै यहाँ,आ एक दूजे का ग़म बँटाया जाए क्यूँ गुम सुम गुम सुम बैठे हो कुछ दूर टहल ही आया जाए ईश्क का पाठ सदा नया लगे आओ फिर से दोहराया जाए वही वही दिन वही वही बातें इक दूजे को फिर सुनाया जाए मुकेश इलाहाबादी ---------

दिल पे छपे कदमो के निशान बताते हैं

दिल पे छपे कदमो के निशान बताते हैं रास्ता जान कोई दिल से गुज़र गया था मुकेश इलाहाबादी -----------------------

इतनी शिद्दत से तू मुझसे मिला न कर

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इतनी शिद्दत से तू मुझसे मिला न कर कि तुझसे बिछड़ूं तो मै रह भी  न पाऊँ मुकेश इलाहाबादी ------------------------