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Showing posts from March, 2015

वक़्त भी ठहर जाता है, तब !

 वक़्त भी ठहर जाता है, तब ! दो दिल मिला करते हैं ,जब ! जाम ऐ ग़म खुद पीता रहा,, हमने किसी को बताया,कब ? तूफाँ, आंधी और स्याह रात शायद के सहर न होगी अब ? तिश्नगी और भी बढ़ जाती है जब - जब याद आये तेरे लब चाँद रूठा,हवा रूठी,फ़ज़ा रूठी यहां तक की रूठ गया है रब मुकेश इलाहाबादी ------------

नदी होते तो अपना रुख मोड़ भी लेते

नदी होते तो अपना रुख मोड़ भी लेते समंदर हो के भला बताओ कहाँ जाएं ? मुकेश इलाहाबादी ----------------------- (पंकज परिमल - की कविता से प्रेरित )

सजा लेती हो लाल बिंदी

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तुम, सजा लेती हो लाल बिंदी, माथे पे और, दहक उठता है सूरज जब,  लगा लेती  हूँ काजल, घिर आते हैं मेघ बेलती हो तुम रोटी, गोल गोल तब , उग आता है पूरा चाँद घर मे   मुकेश इलाहाबादी ------

तुम्हारे मौन से उपजे

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तुम्हारे मौन से उपजे उत्तप्त उच्छवास से पिघल जाता हूँ मै रिस रिस कर   और,बहती है एक नदी   दूर तक ,,,,   सूख जाने के लिए अभिशप्त  अपने ही रेगिस्तान में मुकेश इलाहाबादी -------------

नाल, ठोंक दी गयी है पैरों में

नाल, ठोंक दी गयी है पैरों में कस दी गयी है जीन पीठ पर और नाक मे डाल दी गयी है नकेल मारा जा रहा है चाबुक, सटाक - सटाक और, हम दौड़ रहे हैं विकास की सड़क पे सरपट - सरपट मुकेश इलाहाबादी ------

पृथ्वी मुझसे मांग ले

 पृथ्वी मुझसे मांग ले अपने सारे तत्व अस्थि, मांस - मज्जा जल, वापस ले ले रक्त और कफ़ अग्नि, वापस ले ले  अपना तेज वायु, खींच ले अपनी श्वांस आकाश ले ले अवकाश तब भी मुझमे जो शेष रहेगा उसमे भी तुम शामिल रहोगी आत्म-खण्ड की तरह शिव-शक्ति की तरह ओ मेरे प्रिये ,,,,,, मुकेश इलाहाबादी ------

चहकते हुए आते हो

चहकते हुए आते हो महकते हुए जाते हो दिल सारंगी हो जाए जब जब मुस्काते हो इन मस्त अदाओं से कितना  तड़पाते  हो वस्ल में सावन, और विरह  में  जलाते हो परी सी लागे हो तुम जब आखें झपकाते हो मुकेश इलाहाबादी ---

खाई - खंदक और पहाड आये

खाई - खंदक और पहाड आये तमाम मुस्किलें मेरी राह आये सारा सफर तन्हा काट डाला तुम मुझे रह.रह के याद आये नतो हौसला हारे और न हम दिन चाहे जितने खराब आये हमने तो तुम्हे कईबार बुलाया न तुम आये नही जवाब आये तुम्हे क्या मालूम मुकेश बाबू जीस्त मे कितने सैलाब आये मुकेश इलाहाबादी .....................

ताकि, भूल जाऊं तुमको

ताकि, भूल जाऊं तुमको तुम्हारे जाने के बाद गाड़ आया था ज़मीन में तुम्हारी यादें तुम्हारे खत ,,,,, पर,,, मुझे क्या पता था, ये ज़मीन, हवा और पानी भी तुम्हारा साथ देगी और एक दिन तुम उग आओगी फूल का पौधा बन के और महका करोगी अहर्निश मेरे सहन में मेरे वज़ूद में हरश्रृंगार की तरह मुकेश इलाहाबादी ----- 

ऊसर में उग आयी है दूब,

ऊसर में उग आयी है दूब, तुम, नेह बन के क्यूँ बरसती हो ? मुकेश इलाहाबादी -----------  

किसी की जुस्तजू में अब तक तनहा फिर रहा आफताब

किसी की जुस्तजू में अब तक तनहा फिर रहा आफताब वो तुम ही हो वो उफ़ुक़ जहां डूबना चाहता है आफताब !! मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

यदि, प्रेम भी धतूरे की तरह या कि, बेर की तरह झाडियों मे उगा करता

यदि, प्रेम भी धतूरे की तरह या कि, बेर की तरह झाडियों मे उगा करता तो मै, झउआ भर तोड लाता और डाल देता तुमहारी झोली मे या फिर तुम ही किसी दिन घूमने के बहाने निकलती और अपने आंचल मे भर लाती ढेर सारा प्रेम और उलीच देती मेरे सामने तब हम दोनो खाते प्रेम का मीठा फल और बच जाते आपस मे आये इस कसैले पन से मुकेश इलाहाबादी ..................................

गौरैया खुश थी चोंच मे सतरंगी सपने लिये

गौरैया खुश थी चोंच मे सतरंगी सपने लिये आसमान मे उड रही थी उधर गिद्ध भी खुश था गौरैया को देखकर उसने अपनी पैनी नजरे गडा मासूम गौरैया पे और दबोचना चाहा अपने खूनी पंजे मे गौरैयाए, घबरा के भागी पर कितना भाग पाती ?? आखिर गिद्ध के पंजे मे आ ही गयी गौरैया फडफडा रही थी रो रही थी गिद्ध खुश था अपना शिकार पा के कुछ देर बाद गौरैया अपने नुचे और टूटे पंखों के साथ लहूलुहान जमीं पे पडी थी उसके सतरंगी सपने बिखरे पड़े थे अभी भी उपर, नीले नही लाल आसमान मे कुछ और गौरैया उड रही हैं चोंच मे अपने सतरंगी सपने दबाये जबकि कुछ और गिद्ध बेखौफ उड रहे हैं अपना शिकार पाने के लिये मुकेश इलाहाबादी ---------------

आइना मुझसे मेरा हाल पूछता है

आइना मुझसे मेरा हाल पूछता है कयूं हूं ग़मजदा सवाल पूछता है मिजाजपुर्शी के लिये आया नही, पर हाल मेरा बहरहाल पूछता है मुकेश इलाहाबादी ............

पहले तो डाल से टूट कर खुश हुआ पत्ता

पहले तो डाल से टूट कर खुश हुआ पत्ता हवा में कुछ दूर उड़ा फिर गिर पड़ा पत्ता रोता है अपनी बदनसीबी पे जार -जार जड़ से अपनी उखड कर सूख गया पत्ता मुकेश इलाहाबादी -----------------------

थपेड़े ही थपेड़े हैं, रेत् के घरौंदे हैं

थपेड़े ही थपेड़े हैं, रेत् के घरौंदे हैं जिस्म भीड़ में, मन से अकेले है मुकेश है किसका दामन उजला ? चाँद के जिस्म पे भी स्याह घेरे हैं मुकेश इलाहाबादी -------

तेरे - मेरे हालात पे तब्सरा करूँ

तेरे - मेरे हालात पे तब्सरा करूँ क्या करूँ एक और रतजगा करूँ   दिल जुल्म सहने को राज़ी नही और किससे किससे झगड़ा करूँ   हालत ऐ ज़िंदगी कैसे बदलेंगे ? तू  ही बता किससे मश्वरा करूँ   मौसम ने पत्थर भी तोड़ डाले सर भी जा कर कहाँ फोड़ा करूँ    हर शख्स यहाँ ग़मज़दा मिला ? मुकेश किससे  दुखड़ा रोया करूँ   मुकेश इलाहाबादी --------------

एक और शाम सर्द गुज़री

एक और शाम सर्द गुज़री ख्वाबों के इर्द गिर्द गुज़री तेरी याद फिर फिर आयी और फिर रात ज़र्द गुज़री मुकेश झुलसा गयी मुझे दिन की नदी सुर्ख गुज़री मुकेश इलाहाबादी -----

बेवज़ह तुम ख़फ़ा हो गए

बेवज़ह तुम ख़फ़ा हो गए रास्ते अपने जुदा हो गए बिन खिड़की बिन दरवाज़ा  तुम इक बंद किला हो गए आरज़ू थे तुम मेरी  कभी फिर क्यूँ अब सजा हो गए तस्वीर सही नहीं  दिखती चटका हुआ आइना हो गए है ऐसा क्या हुआ मुकेश ? तुम इतने बदग़ुमा हो गए मुकेश इलाहाबादी ---------

वह मुझे याद करता नही

वह मुझे याद करता नही और मै उसे भूलता नही वो गुमशुदा है नहीं मगर ढूंढता हूँ तो मिलता नही लब तो थरथराते हैं मग़र ज़ुबाँ से कुछ बोलता नही साथ चलने को है आतुर क़दम है कि बढ़ाता नही सुना तो दूँ अपनी कहानी मुकेश है कि सुनता नही मुकेश इलाहाबादी ---------

सिवा रुसवाइयों और बेवफाई के सिवा कुछ भी तो न था,

सिवा रुसवाइयों और बेवफाई के सिवा कुछ भी तो न था, लिहाज़ा किताबे ईश्क लिख के हमने जला डाली है मुकेश मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

तू हमको ही नहीं सबको हसीन लगती है

तू  हमको ही नहीं सबको हसीन लगती है शहजादियाँ भी तेरे आगे कनीज़ लगती हैं तू हँसे तो लगता है जैसे सारा ज़माना हँसे ग़र तू चुप है तो दुनिया ग़मगीन लगती है तेरी हंसी है चांदनी और,ज़ुल्फ़ें हैं बादल,कि तू  समंदर के पानी सी नमकीन लगती है तेरी तारीफ़ में अब इससे ज़्यादा क्या कहूँ तू इन ज़हीनो में भी सबसे ज़हीन लगती है इन आँखों की झील में झपकती हुई पलकें मुकेश पानी में मचलती हुई मीन लगती है मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

चुप्पी अपनी तोड़ो तो

चुप्पी अपनी तोड़ो तो हमसे कुछ बोलो तो   चंदा सा मुख देखन दे  घूंघट थोड़ा खोलो तो   बाँहों का झूला डाला संग -२ मेरे डोलो तो   देखो फागुन आया है रंग प्रेम के घोलो तो   होली  के  हुड़दंग  में हल्ला गुल्ला बोलो तो मुकेश इलाहाबादी ---

ग़र, चाहते हो कि ज़माने से जुदा हो कोई दोस्त,

ग़र, चाहते हो कि ज़माने से जुदा हो कोई दोस्त, बेशक दे देना आवाज़,आजकल हम भी अकेले हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

खुद को सबसे बडा मानता है

खुद को सबसे बडा मानता है कद अपना बौनो से नापता है है नजूमी खुद फुटपाथ पे बैठा पर दूसरों का भाग्य बाचता है उपर वाला सबसे बडा मदारी और इसॉ बंदर सा नाचता है फ़क्त सत्य अहिसां और प्रेम उपर वाले के घर का रास्ता है चॉद को क्या छू लिया मुकेश इन्सा खुद को खुदा जानता है मुकेश इलाहाबादी ...............

दश्त का सफर है

दश्त का सफर है नागों  का  डर  है चराग़  जला  लो रात का सफर है सरायं के नाम पे ये दिले खंडहर है  वीरानियाँ अब तो शाम- ओ- सहर है मुकेश है साथ तो तुम्हे क्या डर है ? मुकेश इलाहाबादी --