आदम का बाग़
सुनो, कल्पना करो एक खूबसूरत और बहुत खूबसूरत बाग़ है आदम का जंहा फूल कभी मुरझाते नहीं - बिलकुल तुम्हारी ख़ूबसूरती की तरह जंहा तुम्हारी साँसों की भीनी भीनी खुशबू चंहु और बिखरी रहती है सोने और चांदी की रंगीन तितलियाँ उड़ती रहती हैं उस आदम के खूबसूरत बाग़ में इत्र के फुहारे और इत्र की ही नदियां बहती हैं उस बाग़ में बारहों माह और तीन सौ पैसठ दिन बसंत रहता है न तो सूरज इतना गरम होता है कि तपन हो न चाँद इतना सर्द होता है कि गलन हो सब कुछ खुशबू - खुशबू सा चन्दन -चन्दन सा महका - महका सा अदम के उस बाग़ की सुबह- शाम और रात तीनो सुनहरी होती है वातावरण में - कंही बांसुरी बजती रहती है तो कंही अनहत नाद की गूँज होती है कंही कोइ कोयल पंचम सुर में कूकती है और फुर्र से आस्मां में उड़ जाती है तो कंही मोर अपनी सतरंगी छटा के साथ थिरकता मिल जाता है ऐसे खुशनुमा - खुशनुमा बाग़ में ऐसे खुशनुमा- खुशनुमा मौसम में तुम हो मै हूँ और ये खूबसूरत अदम का बाग़ हो जिसकी गवाही पैरों के नीचे ज़मी दे रही है सिर के ऊपर चाँद सितारे चमक - दमक रहे हैं तुम और मै - दोनों बगल - बगल चले जा रहे हैं इत...