“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा
Get link
Facebook
X
Pinterest
Email
Other Apps
मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा इक ख़त तुम्हारे नाम से लिखूंगा सुना! नदी सा कल -कल बहती हो तुम्हारे जिस्म पे लहरों से लिखूंगा मुकेश इलाहाबादी ----------------
ज़िदंगी की दो तिहाई सड़क नाप आया। न जाने कितने जंगलात, खाई, खंदक और रेगिस्तान पार कर आया। लेकिन मंजिल के नाम पर महज कुछ सराय खाने या भटियार खाने मिले। जहां चंद लम्हात की सहूलियत और फिर रवानगी, न मिलने वाली मंजिल की। लिहाजा अब तो सारे अरमानों को कफ़न दे दिया है और सफ़र को ही मुक़ददर मान लिया है। अपने मुकददर को ही लिये दिये उन दिनों भी चल रहा था, कि राह में एक सरायखाने से इत्तिफाक हुआ। जिसकी बातें आज एक अर्से के बाद भी यादों की पगड़डी में मील के पत्थर सा ठुंकी हुयी हैं। बात उन दिनों की है जब यह षख्स जवान हुआ करता था। दिल में जोश व बदन में ताकत हुआ करती थी। चटटान को तोड़ने व नदियों को पार करने का हौसला हुआ करता था। लेकिन जिसका दिल बच्चों सा मासूम था। अंदाज मस्ती भरा था। वह अपने कधों तक झूलते बालों व अलमस्त फक्कडी अंदाज को लिये दिये एक दिन अपनी मुकम्मल मंजिल की तलाष में निकल पड़ा। भटकता रहा शहर दर षहर जंगल दर जंगल। उस दौरान न जाने कितने दरख्तों को अपना साया बनाया न जाने कितने पड़ावों पे रात गुजारी न जाने कितने खेत खलिहानों को रौंदा मगर कहीं कोई मंजर उसे रास न आता, उसे लगता...
एकांत एक नदी है जिसमे मै पड़ा रहना चाहता हूँ किसी मगरमछ की तरह या फिर बहता रहना चाहता हूँ, चुपचाप, किसी टूटे पेड़ के तने या लट्ठे जैसा या फिर बिन नाविक बिन पतवार की नाव सा जिसमे लदे हैं मेरे सारे दुःख सारे सुख सारे भाव सारे विभाव और वो नाव जो सिर्फ हवा के बहाव से बहती हुई हिंद महासागर सहित सातों समंदर से होती हुई, पृथ्वी के किनारे पहुँच गिर जाए अनंत के महा शून्य मे जंहा मै सुन सकूँ अपनी रगों का स्पंदन और दिल की धड़कन और, सुन सकूँ तुम्हारी पुकार जिसे तुमने कभी उच्चारित ही नही किया मेरे लिये मुकेश इलाहाबादी,,,,,, सभी रिएक्शन: 24 24
बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है वर्ना इक तरफ़ा ईश्क़ सजा देता है रात वस्ल की हो या फिर हिज़्र की ईश्क़ तो आँखों को रतजगा देता है ईश्क़जादों को जलने का नहो खौफ ईश्क़ इन्सा को परवाना बना देता है गोरा हो काला हो कि छोटा या बड़ा सच्चा ईश्क़ तो हरभेद मिटा देता है ख़ुदा से हो या फिर उसके बन्दे से ईश्क़ वो शै जो दीवाना बना देता है मुकेश इलाहाबादी ----------------
Comments
Post a Comment