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Showing posts from March, 2018

राख को बार बार न कुरेदा जाए

राख को बार बार न कुरेदा जाए बुझी आग को न भड़काया जाए आओ, बादलों के पार उड़ा जाए रूठे हुए चन्दा को, मनाया जाए टहलते हुए नदी किनारे चलते हैं कंधे से कंधा जोड़ कर बैठा जाए मौत से भी ठंडी खामोशी क्यूँ हैं कोई कहानी किस्सा छेड़ा जाये आ फिर से बचपना  जिया जाये मिल के छुपम छुपाई खेला जाये सुना दोस्ती के पार बागे इश्क़ है आ कुछ दिन वँहा भी ठहरा जाए मुकेश शहर में तो बहुत रह लिए कुछ दिन तो जंगल में रहा जाये मुकेश इलाहाबादी -------------

पीली, लाल, हरी, नारंगी देखा

पीली, लाल, हरी, नारंगी देखा हमने दुनिया रंग बिरंगी देखा जब से सात सुरों को साधा तो तन तम्बूरा मन सारंगी देखा हैं बातों में कुछ, कर्मों में कुछ चाल बड़ों बड़ों की दुरंगी देखा मुकेश इलाहाबादी ---------

उधर तेरी आँखों में इक नीली झील बहती है

उधर तेरी आँखों में इक नीली झील बहती है  इधर, मेरे होंठो में इक प्यास निहाँ रहती है  ज़िंदगी जब कभी फुर्सत देती है पल दो पल  जाने क्या क्या मुझसे मेरी तन्हाई कहती है  मुकेश इलाहाबादी ------------------------

जी तो चाहता हैं बाँहों में ले कर देखूं

जी तो चाहता हैं बाँहों में ले कर देखूं चाँद फ़लक़ से उतरे तो जी भर देखूँ ख़ुदा ! ऐसा कर मुझे परिंदा बना दे बादलों के पार जा तुम्हारा घर देखूं तुझे इक बार देख कर जी न भरेगा जी तो चाहे है तुझे शामो-सहर देखूँ तेरी तस्वीर लगा रखी है हर तरफ मुकेश सिर्फ तुझे देखूँ, जिधर देखूँ मुकेश इलाहाबादी -------------------

अस्मा पे देखा तो सूरज गायब

अस्मा पे देखा तो सूरज गायब रात के पहलू से महताब गायब ज़माना देखता हूँ, हैरत होती है इंसानों के धड़ हैं पर सर ग़ायब छटपटा रहे हैं अपने घोंसलों में परिंदों के जिस्म से पर गायब मै इक दिन इश्क़ करने निकला दिखा ! मेरे सीने से दिल गायब दिहाड़ी से लौटे मज़दूर तो उन्हें बस्ती में मिला अपना घर ग़ायब मुकेश इलाहाबादी --------------

कोई अपना हुआ या न हुआ करे

कोई अपना हुआ या न हुआ करे रब मगर सब की खैर किया करे भले जेठ बैसाख सूरज तपा करे जेठ बैसाख तो बादल बरसा करे यूँ तो शख्श मसरूफ है आजकल मगर तीज त्यौहार तो मिला करे भले कोई हमारा कितना बुरा करे दिल अपना सब के लिए दुआ करे सच व आन बान के लिए तना रहे सिर मग़र बड़ों के आगे झुका रहे मुकेश इलाहाबादी --------------

मेरे हाथों में चाबुक नहीं है

अच्छा है मेरे हाथों में चाबुक नहीं है वरना न जाने कितने घोड़े जो सरपट सरपट दौड़ रहे हैं मेरी चाबुक से लहू लुहान हो चुके होते वज़ह उनकी कम रफ़्तार नहीं वज़ह मेरे हिसाब से न दौड़ने की होती अच्छा हुआ मेरे हाथों में चाबुक नहीं है वरना न जाने कितने निर्दोष सिर्फ इस बात पे चाबुक खा चुके होते कि वे दूसरों के रथ में क्यूँ जुते हैं ? सिर्फ घोड़े ही क्यूँ अगर मेरे हाथ में भी चाबुक होती तो गधों को भी मार मार के घोडा बना के अपने हिसाब से हाँकता और अच्छे से अच्छे घोड़ों को भी चाबुक के दम पे गधा बना चूका होता और विकास की रफ़्तार में सभी गधे और घोड़े सरपट सरपट दौड़ रहे होते खैर ! फ़िलहाल मेरे पास सिर्फ शब्दों की चाबुक है जिससे कभी खुद को तो कभी कागज़ को लहूलुहान कर रहा हूँ वैसे मैंने सुना है, ईश्वर के पास भी एक चाबुक होती है जो सब को नहीं दिखती - अदृश्य रहती है जिसकी मार से कोई बच नहीं सकता चाहे कितना भी सयाना घोडा या घुड़सवार क्यूँ न हो मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

तुम्हारे नाम की तकिया

सिरहाने लगा लेता हूँ तुम्हारे नाम की तकिया और डूब जाता हूँ एक गहरी और मीठी नींद में मुकेश इलाहाबादी ---------

अखण्ड ज्योति

बहुत पहले, तुमसे  मिलने के पहले  गहन अंधेरा था पर अब अहर्निश जलती है अखण्ड ज्योति मेरे अंतर्मन के, प्रकोष्ठ में तुम्हारे नाम की मुकेश इलाहाबादी ----

चाँद !

चाँद ! तुम्हे क्या पता, जिस दिन तुम नहीं होते हो रात कितनी काली होती है चाँद , भले तुम बहुत दूर हो पर तुम्हारे होने भर से बिन चराग बिन मशाल दूर बहुत दूर तक सफर कर सकता हूँ चाँद जब तुम चल चल के थक जाना तो उफ़ुक़ पे जा के मत डूबना मै अपनी बाँहे फैला लूँगा तुम आना और उसमे डूब जाना सुनो ! सुन रहे हो न मेरे चाँद ??? मुकेश इलाहाबादी --------------

किसी गुलाबी जाड़े की

सोचता हूँ किसी गुलाबी जाड़े की गुनगुनी सुबह जब तुम सो रही हो (करवट - मुड़े हुए घुटनो के बीच दोनो हथेली छुपाये हुए ) अस्त - व्यस्त लिहाफ में अध् खुली ठीक तभी तुम्हारी बॉलकनी की खड़की को लाँघ उतर आऊं सुबह की नर्म धूप सा, तुम्हारे बिस्तर पे और लिपट जाऊँ तुमसे गर्म लिहाफ़ सा मुकेश इलाहाबादी ----------------

तेरे बदन की खुशबू से तरबतर हो जाऊँ

तेरे बदन की खुशबू से तरबतर हो जाऊँ स्याह घनी ज़ुल्फ़ों की छाँव में सो जाऊँ मंज़िल तक पंहुचा देगा कोई भी रास्ता सोचता हूँ राहे ईश्क़ में चलकर खो जाऊँ  मुकेश इलाहाबादी --------------------

सांझ होते ही फ़लक़ पे टाँक देता है

सांझ होते ही फ़लक़ पे टाँक देता है चमकते - धमकते सितारे और एक खूबसूरत चाँद जिन्हे दिन भर सहेजे रखता है अपनी जेब में बड़ी एहतियात से और फिर , इन चाँद -सितारों के साथ निकल पड़ता है सैर पे - दूर बहुत दूर देश जँहा - आबनूसी बालों और रूई के फाहों जैसे गालों मूंगिया होंठो वाली 'परी' जो उसे देख मुस्कुराती है दोस्ती का हाथ बढ़ाती है वो भी हाथ बढ़ाता है पर, हाथ मिलाने के पहले ही सितारे टूट कर बिखर जाते हैं और फिर वो बिखरे हुए सितारों को बीनता है सहजता है एक बार फिर सितारों को आसमान में टाँकने के लिए मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------

हमने सुना एक दूजे को

"आओ ! बैठो, चुपचाप, और हम - सुने एक दूजे को " मैंने कहा -- वो भी, मुस्कुरा के घुटने मोड़ के, बैठ गयी चुप - चाप और फिर ,,, हमने सुना एक दूजे को बहुत देर तक मुकेश इलाहाबादी ---------------

इन गुलाबी आँखों में छुपे हुए दर्द का अंदाज़ा नहीं होता

इन गुलाबी आँखों में छुपे हुए दर्द का अंदाज़ा नहीं होता आप  की तस्वीर से आप की उम्र का अंदाज़ा नहीं होता कौन कमबख्त कहता है फूलों की उम्र फ़क़त एक दिन आप हो कितनी बेमिशाल मिल कर अन्दाज़ा नहीं होता मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

आज फिर उदास हुआ मन

आज फिर उदास हुआ मन किसी की याद में रहा मन जा - जा कर लौट आता है है  उसी  खूँटी पे टंगा मन तुम हमें छोड़ के क्या गए है तभी से बुझा- बुझा मन ये दौलत हो गयी तुम्हारी अब कंहा रहा हमारा मन मुकेश इलाहाबादी ---------

गुस्सा चाँद की बदगुमानी पे आता है

गुस्सा चाँद की बदगुमानी पे आता है रह- रह कर प्यार भी उसी पे आता है बार बार क्यूँ चूम लेती है गुलाबी होंठ  गुस्सा मुझे उसकी नथुनी पे आता है है ज़िन्दगी उसके बगैर बीती जा रही रह रह गुस्सा ऐसी ज़िंदगी पे आता है मुकेश इलाहाबादी -------------------

यादों के मांझे से बाँध

यादों के मांझे से बाँध तुम्हारे नाम की पतंग तान देता हूँ और फिर पतंग को उम्मीदों के फ़लक़ पे उड़ते हुए देख कर खुश हो लेता हूँ रोज़ दर रोज़ मुकेश इलाहाबादी ------------

कोई भौंरा नहीं कोई तितली नहीं

कोई भौंरा नहीं कोई तितली नहीं वज़ह मेरे बाग़ में हरियाली नहीं मेरे चेहरे पे उदासी की वज़ह मेरे  कैलेंडर में ईद नहीं दिवाली नहीं मुकेश इलाहाबादी ---------------

बुलबुल, दीवार पे चुप चुप अच्छी नहीं लगती

बुलबुल, दीवार पे चुप चुप अच्छी नहीं लगती तुम्हारी खामोशी बिलकुल अच्छी नहीं लगती तुम थे साथ अपने तो हर मौसम सावन भादों तुम बिन ये बादल- बारिस अच्छी नहीं लगती मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

सिर्फ एक बार ऐसा हुआ था

सिर्फ एक बार ऐसा हुआ था अपनी हथेलियों में मैंने तुम्हारे गुदाज़ चेहरे को रख लिया था हौले से और तुमने भी अपनी कमल सी आँखे मेरी आँखों से मिला दिया  और फिर कुछ ज़्यादा लाड में  आकर तुमने,अपनी नाक की नोक मेरी नाक की नोक से मिला कर मुस्कुरा दी थी, और तब -- सिमट आया था सारा का सारा वक़्त सारी जंहा की खुशी सारी क़ायनात हम दोनों की नाक की नोक पे मुकेश इलाहाबादी ---------------

पहले मुझे ज़बानी याद था

पहले मुझे ज़बानी याद था तुमसे बिछड़े, कितने दिन हो गए फिर उँगलियों के पोरों पे गिन लेता कितने हफ्ते कितने महीने हुए  तुमसे बात नहीं हुई मुलाकात नहीं हुई उँगलियों के पोर कम लगने लगे तो दीवार के कलैण्डर और डायरी के पन्ने तुमसे जुदाई का हिसाब रखते तुम्हारी चुप्पी और वक़्त ने डायरी के पन्नो पे धूल की ज़िल्द चढ़ा दी है चाहूँ तो हथेली से डायरी की धूल हटा दूँ - और एक बार फिर पढ़ लूँ वो चमकते दमकते नीले हर्फ़ जो तुम्हारी याद का चाँद और सूरज बन चमकते हैं मेरे दिन और रात में - किन्तु नहीं मै इस वक़्त एक सिगरेट निकलूंगा और डिब्बी पे ठक -ठक कर के होठों के बीच ले जा कर सुलगाऊँगा और खिड़की के परदे हटा कर देखूँगा दूर तक फ़ैली सूनसान सड़क के बेवज़ह और निरुद्देश्य सिगरेट के ख़त्म होने तक मुकेश इलाहाबादी ---------------

जिस्म व रूह दोनों लहूलुहान हैं

जिस्म व रूह दोनों लहूलुहान हैं हर शख्श हैरान और परेशान हैं इंसानो में सिर्फ वे गिने जायेंगे जो जो धनवान,हैं या बलवान हैं बे - वजह बुत परशती करते हो धनबली बाहुबली ही भगवान हैं इंसान इस क़दर गिर जायेगा ये देख ऊपर वाला भी हैरान है मुकेश बेवकूफ हो घर ढूंढते हो यहाँ सिर्फ मॉल हैं या दुकान हैं मुकेश इलाहाबादी -----------

एक बार तुझे जी भर के देख लूँ

एक बार तुझे जी भर के देख लूँ फिर तू खो जाये, फिर खोज लूँ किसी दिन चाँदनी रात में मिल बाहों में भरूँ और तुझे चूम लूँ तुम जल्दी जाने की जिद करो मै मनुहार करूँ और तुझे रोक लूँ गर तू गुस्सा न हो मेरी बातों से मुकेश आज दिल की बात कर लूँ मुकेश इलाहाबादी -------------

ताज़ा गुलाब ले आया

देख, ईश्क़ के खिले ताज़ा गुलाब ले आया प्यार की ओस में भीगे जज़्बात ले आया हैं शावक कूदते मोर नाचते,कोयलें कूंकती जंगल की इक खूबसूरत शाम ले आया नफरत और शोलों के शहर में मुहब्बत की ख़बरों का अख़बार ले आया लौटा हूँ अभी - अभी अपने प्रिय के गाँव से मत पूँछ मुकेश, कितनी मीठी यादें अपने साथ लाया मुकेश इलाहाबादी ----------

कहो तो प्यार भीनी- भीनी खुशबू से

कहो तो प्यार भीनी- भीनी खुशबू से मौसम, को गेंदा -गुलाब कर दूँ क्या ऑ सतरंगी चुनरी से सजे, मेरी चाँद तेरे आँचल में सितारे भी भर दूँ क्या तू ,राधा सी गोरी मै कान्हा सा काला तुझ संग ज़ीस्त महारास कर दूँ क्या गोरी तुझको मै बाँहों में भर के, आज अपनी ये होली यादगार कर दूँ क्या ? मुकेश इलाहाबादी --------------