चाँद !


चाँद !
तुम्हे क्या पता,
जिस दिन तुम नहीं होते हो
रात कितनी काली होती है

चाँद ,
भले तुम बहुत दूर हो
पर तुम्हारे होने भर से
बिन चराग बिन मशाल
दूर बहुत दूर तक सफर कर सकता हूँ

चाँद
जब तुम चल चल के थक जाना
तो उफ़ुक़ पे जा के मत डूबना
मै अपनी बाँहे फैला लूँगा
तुम आना और उसमे डूब जाना

सुनो ! सुन रहे हो न मेरे चाँद ???

मुकेश इलाहाबादी --------------

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