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Showing posts from May, 2017

आप की तस्वीर देखूं तो सुबह होती है

आप की तस्वीर देखूं तो सुबह होती है आप से गुड़ नाइट करूँ तो रात होती है कुछ ऐसे रिश्ते बन जाते हैं कि,मुकेश जिन्से न मिलो तो ज़िंदगी उदास होती है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

ग़म के आँसुओं को पिया है हमने

ग़म के आँसुओं को पिया है हमने इस तरह तिश्नगी मिटाया है हमने अपने घाव पे हमने फूल रख दिया किस तरह ज़ख्म छुपाया है हमने मेरा माज़ी मत याद दिला, उसको बड़ी मुश्किल से भुलाया है हमने  अंधेरी रातों में तन्हा भटका किये किसी तरह ज़िंदगी जिया है हमने मुकेश इलाहाबादी ----------------

मेरी दोस्ती से दिल भर गया शायद

मेरी  दोस्ती  से दिल भर गया शायद तभी मेरे ख़त जवाब नहीं आया शायद सुना है मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो तुम्हे मुझसे बेहतर मिल गया शायद? जिस मुहब्बत को सब कुछ समझे थे वो हक़ीक़त नहीं कोई ख़ाब था शायद बेगुनाह  हो  कर भी सजा पा रहा हूँ   सच को सच कहना नहीं आया शायद वक़्त का मरहम भी नहीं भर पाया मेरा घाव घाव नहीं नासूर था शायद  मुकेश इलाहाबादी -------------------

छाता

जब भी ईश्क़ की बदरिया बरसती है तुम, लगा लेती हो 'खामोशी' का छाता और बचा लेती हो ख़ुद को भीगने से मुकेश इलाहाबादी ------

तब, लबालब थीं - तुम

तब,  लबालब थीं - तुम बही उमड़ती घुमड़ती बलखाती यौवन के सावन में पर कुछ दूर चल कर सूख गयीं तुम शायद पहाड़ी नदी थी - तुम और तुम्हारा प्रेम यदि नहीं तो बरसो फिर बरसो और मै भीगूँ झम झमा झम - अनवरत -अहर्निश बाहर से अंतरतम तक मुकेश इलाहाबादी --------------------

अढ़ाई बूँद

हर, रोज़ अढ़ाई बूँद अमृत की पीला जाती हैं तुम्हारी यादें और एक बार फिर मै, जी जाता हूँ मरते - मरते मुकेश इलाहाबादी ----

हवा में पुल

तुम्हारी एक दुनिया है मेरी एक दुनिया है एक दिन उधर से तुमने हँसी उछाली इधर से मै मुस्कुराया और...  एक  पुल तामील हो गया हवा में और ! हम दोनों दौड़ के लिपट गए इक दूजे से और ,,, इस तरह लटकते रहे हवा के पुल में ख्वाब के टूटने तक मुकेश इलाहाबादी ----------

तेरे यादों की खिडकियाँ खोल दी

बेहद अँधेरा था उमस थी घुटन थी बेचैनी थी तेरे यादों की खिडकियाँ खोल दी तेरे नाम की धूप जला दी अब धूप है हवा है रोशनी है खुशबू है अब ! मै काफी शुकून में हूँ मुकेश इलाहाबादी -----------

इक पल को ही सही बात कर लेना

इक पल को ही सही बात कर लेना किसी छुट्टी को मुलाकात कर लेना जानता  हूँ  बहुत मसरूफ रहते हो फुर्सत मिले तो हमे याद कर लेना यूँ तो  हमने  कोई खता  नहीं  की मिल के जी भर शिकायत कर लेना कम से क़म इतना तो वास्ता रख रस्ते में मिलूं तो सलाम कर लेना मुकेश इलाहाबादी ----------------

कोइ नदी नहीं है, नाला नहीं है

कोइ नदी नहीं  है, नाला नहीं है  फिर भी आगे का रास्ता नहीं है  साथ-साथ सफर किया जिसके  उस्से रिश्ता नहीं वास्ता नहीं है  सिर्फ मुर्दा यादें यहाँ पे रहती हैं  इस मकाँ में कोइ रहता नहीं है सिर्फ  शोरो  गुल मिलेगा यहाँ  कोई  किसी की  सुनता नहीं है  सिल लिए मुकेश ने लब अपने  किसी से कुछ वो कहता नहीं है  मुकेश इलाहाबादी -------------

कोइ नदी नहीं है, नाला नहीं है

कोइ नदी नहीं  है, नाला नहीं है फिर भी आगे का रास्ता नहीं है साथ-साथ सफर किया जिसके उस्से रिश्ता नहीं वास्ता नहीं है सिर्फ मुर्दा यादें यहाँ पे रहती हैं इस मकाँ में कोइ रहता नहीं है मुकेश इलाहाबादी -------------

इतिहासवेत्ता खोज लाये

इतिहासवेत्ता खोज लाये किताबों और धरती को खोद के हड़प्पा और मोहन जोदड़ो की सभ्यता  खोज लाये सभय्ता के इन खंडहरों में भग्न इमारतें टूटी हुई सड़के बुझे हुए चूल्हे सूखे हुए पोखर टूटी हुई छतों के मुंडेर काश ! इतिहास वेत्ता इन भग्नावशेषों में खोज पाते मानव गंध शाश्वत प्रेम तो ज़रूर वहां मिलता वो पोखर जंहा तुम मुझसे मिलने आती थी गागर भरने के बहाने वो वट वृक्ष और अमराई भी मिल जाती जिसके तले मैंने लिया था तुम्हारा पहला चुम्बन वो खेत जहाँ से साँझ लौटता कंधे पे धरे धरे हल - मगन और मिलती तुम अपनी डेहरी पे करते हुए मेरा इंतज़ार काश इतिहास वेत्ता खोज पाते ये सब भी तो मुझे न दिलाना पड़ता याद, तुम्हे कि मेरा तुमसे प्रेम आज या कल का नहीं सदियों सदियों पुराना है इतना पुराना जितना मोहन जोदड़ो की सभ्यता या की उससे भी पहले, यानी कि वैदिक काल, या की जब से मानव ने पृथ्वी पे कदम रखे हैं ओ ! मेरी ईव ओ ! मेरी शतरूपा ओ ! मेरी सुमी - सुन रही हो न ?? तुम्हरा मनु तुम्हरा ऐडम मुकेश इलाहाबादी -------------------

तुम्हे क्या मालूम ?

तुम्हे  क्या मालूम ? रिश्तों के सूखे पत्तों के अलाव से काट रहा हूँ ज़िंदगी की शेष सर्द रातें मुकेश इलाहाबादी ----

बंद , आँखों से भी पहचान लूँगा

बंद , आँखों से भी पहचान लूँगा तुम्हे, तुम्हारी पदचाप से हज़ार खुशबुओं में भी जान लूँगा तुम्हे, तुम्हारे बदन की खुशबू से कि, तुम मुझमे समाहित हो पंच महाभूतों और , मन बुद्धि चित्त के साथ हमेशा -  हमेशा के लिए ओ ! मेरी प्रिये मेरी आत्म खंड ओ ! मेरी सोल मेट मुकेश इलाहाबादी -------

सलमा - सितारा

जब, तुम अपनी उलझी लटों को संभालते हुए रसोंई के कामो को अधूरा छोड मेरी अधूरी पहनी कमीज पे टाँकती हो बटन तब तुम बटन नहीं रिश्तों की चादर पे  टाँक रही होती हो, सलमा - सितारा मुकेश इलाहाबादी ----------------

डेहरी पे बैठी स्त्री

घिरती सांझ का अँधेरा हो, या कि, इंतज़ार की बेचैनी डिगा नहीं पाती हिला नहीं पाती जब तक, कि उसका प्रिय आ नहीं जाता छज्जे पे खड़ी या डेहरी पे बैठी स्त्री को मुकेश इलाहाबादी ---------

निचाट अँधेरा था

मै तो, निचाट अँधेरा था तुमने आ के जगमग कर दिया मुकेश इलाहाबादी -----

कोई, तो अदृश्य नाल है

कोई, तो अदृश्य नाल है जिसने जोड़ रक्खा है हमको तुमको इक दूजे से  वर्ना, कब के खो गए होते ज़माने की भीड़ में मुकेश इलाहाबादी ----

तुम्हारे चेहरे का नमक

तुम्हारे चेहरे का नमक और मीठी मीठी बातें रिश्तों का ज़ायका बढ़ा देती हैं मुकेश इलाहाबादी ----

तुम्हारा , कहा सब कुछ करूँगा

तुम्हारा ,  कहा सब कुछ करूँगा  सिवाय तुझे चाहते रहने के  मुकेश इलाहाबादी ----------

ग़र, तू नहीं तो

ग़र, तू नहीं तो मेरी साँसों के आरोह - अवरोह में कौन प्राण ऊर्जा भरता है ? मुकेश इलाहाबादी ----------

आकाश एक शहर है

आकाश   एक शहर है इस बड़े खूब बड़े से शहर में इक धरती है इक  सूरज है सूरज धरती  को देख मुस्कुराता है ब्रम्हांड में अहर्निश चक्कर लगता है धरती सूरज के लिए नाचती है अपनी धुरी पे धानी चुनरी ओढ़े सूरज के आकर्षण में बिंधी - बिंधी इक चाँद भी है - धरती की मुहब्बत में गाफिल जो हर रात नई - नई कलाओं से लुभाना चाहता है धरती को कुछ तारे  भी हैं - जो चुप चाप देखते हैं इश्क़ बाजी चाँद की, सूरज की इन सब के अलावा इक सितारा भी है उत्तर में जिसे ध्रुव तारा कहते हैं ये ध्रुव तारा भी फिरफ्तार है - पृथ्वी की मुहब्बत में अटल - निश्चल ये तारा - ध्रुव तारा चुप रहता है कुछ नहीं कहता है सिर्फ इक कोने से धरती को देखता है शाम से सुबह तक और फिर डूब जाता है आकश के न जाने किस अँधेरे में शाम को फिर से उगने और अपनी प्यारी धरती को देखने के लिए सुमी, इन सब में तुम धरती और मुझे ध्रुव तारा जानो सूरज और चाँद में बारे में मुझसे  मत पूछो मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

एक पति की आत्मस्वीक्रति

एक पति की आत्मस्वीक्रति चुन्नों, मेरा चष्मा कंहा रखा है ? चुन्नो मेरी नयी वाली कमीज नहीं मिल रही है, चुन्नो तुमने मेरा रुमाल देखा है क्या ? चुन्नो एक कप चाय मिलेगी क्या? चुन्नो चुन्नो चुन्नो सच घर आते ही चुन्नो चुन्नो के नाम की माला जपने लगता हूं। सच आफिस मे रहता हूं तो आफिस की छोटी छोटी बातें नही भूलती पर घर आते ही जैसे यादें हैं कि साथ छोड के फिर से आफिस मे ही दुपुक जाती हैं ये कह के कि जाओ अब अपनी चुन्नो के साथ ही रहो मेरी क्या जरुरत है वो जो है न तुम्हारी और तुम्हारे घर की हर छोटी बडी चीजें याद रखने के लिये। और सच चुन्नो सिर्फ यादें ही क्यूं घर आते ही न जाने क्यूं निर्णय लेनी की क्षमता को भी जैसे ग्रहण लग जाता है। छोटी छोटी बातों के लिये भी तुम्हारी सलाह के बिना काम नही कर पाता चाहे वह सब्जी लाने का हो तो पूछना पडता है बाजार जा रहा हूं क्या सब्जी लाउं? शाम  की पार्टी मे कौन सी ड्रेस पहनूं ? इस दिवाली पे दीवारों पे कौन सा रंग करवाउं या कि दोस्त की सालगिरह पे क्या गिफट देना है, बेटे को इस सर्दी पे सूट बनवाया जाये कि ब्लेजर ही दिलवाया जाये, सच ये सब भी बिना तुमसे पूछे निर्णय नही ...

हंसी इक चिड़िया है

तुम्हारी हंसी इक चिड़िया है जो कभी  - कभी फुर्र - फुर्र उड़ती हुई मुंडेर पे बैठ जाती है और फिर मेरी उदास मुंडेर देर तक मुस्कुराती है नरम धूप का दुशाला ओढ़े हुए मुकेश इलाहाबादी ------------

यादों की संदूकची

साड़ी , के रंग से मैच खाती तुम्हारे गोल से चेहरे की गोल सी बिंदी, छोटी सी तुम्हारी दूधिया सी मखमली हंसी कानो के कुंडल की झपकती - चमकती परछाईं चूड़ियों और कंगन की खनखन पायल की छन - छन और ढेर सारी यादें तह कर रख ली हैं एहतियात से  यादों की संदूकची में जिन्हे, जब कभी जी उदास होगा या, कि तेरी याद में हूब - चूब करेगा जी तब संदूकची खोल देख लिया करूंगा तुझे और इस संदूकची की चाबी किसी को नहीं दूंगा किसी को भी नहीं दूंगा - तेरी यादों की संदूकची की चाबी। मुकेश इलाहाबादी ------------------------

वो तो तेरे ख्वाब हैं, जो लोरियां सुना,सुला जाते हैं वरना नींद कहाँ आती है कमबख्त स्याह रातों में मुकेश इलाहाबादी ------------------------

वो तो तेरे ख्वाब हैं, जो लोरियां सुना,सुला जाते हैं वरना नींद कहाँ आती है कमबख्त स्याह रातों में मुकेश इलाहाबादी ------------------------

मेरी खामोशी तेरी यादों से गुफ्तगू करती है

मेरी खामोशी तेरी यादों से गुफ्तगू करती है लोग समझते हैं मुकेश खामोश रहता है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

बुलुप की आवाज़ होती है

बुलुप की आवाज़ होती है और ........ दूर तक लहरें वृत्ताकार हो कर फ़ैल जाती हैं जब तुम फेंकते हो ठहरे हुए जल में एक कंकरी बस ऐसे ही मन चंचल हो उठता है जब तुम मुस्कुरा के चले जाते हो  बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने मुकेश इलाहाबादी ---------------

एक और सूरज ऊगा देंगे लोग

एक और सूरज ऊगा  देंगे लोग बहते हुए दरिया सुखा देंगे लोग कारखाने और दुकान बनाने को सतपुड़ा, हिमालय ढहा देंगे लोग  शह्र बसाने है तरक्की पसंदो को  खेत और जंगल मिटा देंगे लोग धरती का आँचल धानी नहीं पीला आसमान को सुर्ख बना देंगे लोग स्वार्थ इस क़दर होता जायेगा तो   ज़मी से इंसानियत मिटा देंगे लोग मुकेश इलाहाबादी -------------

लिखता रहूंगा प्रेम

मै, उम्र भर लिखता रहूंगा प्रेम और तुम अस्वीकारती रहोगी अपनी मौन 'हाँ; से मुकेश इलाहाबादी ----

ढाई आखर

उम्र, भर मौन रह कर प्रतीक्षा करूँगा तम्हारे मुख से ढाई आखर सुनने को मुकेश इलाहाबादी --

दिल में सूरज उगाये बैठे हैं,

दिल में सूरज उगाये बैठे हैं, आग इश्क़ की लगाये बैठे हैं जाने कब चाँद छत पे आये सभी टकटकी लगाए बैठे हैं कोइ दवा न देगा, इसीलिए ज़ख्म अपने छुपाये बैठे हैं करते हैं बात, साफ़ सुथरी मन में गिरह लगाए बैठे हैं जब से कलंदरी रास आयी हम सब कुछ लुटाये बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी ---------

तुम, जब चलती हो ले के माथे, पे घूंघट

तुम, जब, चलती हो ले के माथे, पे घूंघट, हथेलियों पे मेहंदी, कलाइयों में, खन -खन चूड़ियाँ छम - छम करती पायल महावर लगे पाँव तब देवताओं का भी आसान डोलता है मुकेश इलाहाबादी ---------------------

आओ चलो कुछ दूर घूम आयें

आओ चलो कुछ दूर घूम आयें खुशनुमा मौसम से मिल आयें देखो तो बारिश होने वाली है पानी में छप - छप कर आयें  मुकेश इलाहाबादी ------------

कभी हमको भी तो ख़त लिखा करो

कभी हमको भी तो  ख़त लिखा करो ख़त न सही एस एम् एस किया करो तुम्हारे पास स्मार्ट फ़ोन तो होगा ही हमको भी तो व्हाट्स ऐप किया करो बहुत प्यारी प्यारी ग़ज़लें लिखता हूँ  तुम  सिर्फ  मेरी ही  पोस्ट पढ़ा करो ऍफ़ बी सब मजनू धोके बाज़ है, कि तुम केवल मुकेश से चैट किया करो मुकेश इलाहाबादी --------------------

तड़पता है तो सिर्फ तेरे लिए तड़पता है

तड़पता है तो सिर्फ तेरे लिए तड़पता है वर्ना तो दिल मेरा हरदम  खुश रहता है यूँ तो  मेरा गुले दिल मुरझाया मिलेगा पाऊँ तेरा साथ तो खिला खिला रहता है सूरज की कड़ी धूप मेरा क्या कर लेगी तेरी यादों का साया सिर पे जो होता है मुकेश इलाहाबादी ---------------------

बहुत प्यारा सा इत्तेफ़ाक़ हुआ है

बहुत प्यारा सा इत्तेफ़ाक़  हुआ है आँख खुलते ही तेरा दीदार हुआ है तू छत पर बाल सुखाने क्या आयी आज सुबो सूरज नहीं चाँद ऊगा है जो दिल अब तक फिरता था आवारा तुझे देखा तो हमको भी प्यार हुआ है मुकेश इलाहाबादी ---------------

तुम, ही छन्द हो

तुम, ही छन्द हो तुम ही बंद हो तुम ही लय हो तुम ही अर्ध विराम तुम ही पूर्ण विराम हो तुम ही आरम्भ तुम अंत हो मेरी कविता का ओ ! मेरी कविता ओ ! मेरी सुमी सुन रही हो न ? पढ़ रही हो न मेरी कवितायेँ ? मुकेश इलाहाबादी ---------

होगी सुबह होते होते

होगी सुबह होते होते कटेगी रात रोते रोते निशाने इश्क़ जाएँगे आँसुओं से धोते धोते बेतरह  थक  गया हूँ तेरी यादें ढोते - ढोते तमाम उम्र  काट  दी  बिस्तर पे सोते सोते मुश्किल से मिला है मेरा चाँद खोते खोते मुकेश इलाहाबादी ----

फिर बहुत बरसा है मन

फिर बहुत बरसा है मन तुम बिन तड़पता है मन तू अब किसी ग़ैर की है क्यूँ नहीं मानता है मन रातों -दिन समझाता हूँ मेरी कहाँ सुनता है मन   दिन,परिंदे से उड़ता है साँझ, चहचाता है मन इक बार, तू भी बता दे क्या कहता है तेरा मन मुकेश इलाहाबादी -----

एक प्यारी सी कविता लिखूँ

सोचा एक प्यारी सी कविता लिखूँ जो चाँद सी प्यारी प्यारी हो कपास सी उजली उजली हो गुलाब सी महकती महकती हो रेशम सी मुलायम - मुलायम  हो और नदी सी छछलाती सी हो तो बहुत देर सोचने के बाद फैसला लिया क्यों न तुम पर कविता लिखी जाए तो क्यूँ - लिखूँ ??? दोस्त मुकेश इलाहाबादी ------

तुम चले जाओगे तो

तुम चले जाओगे तो ज़िंदगी अधूरी तो न होगी पर, तुम बिन ज़िंदगी पूरी भी न होगी मुकेश इलाहाबादी ----

न जाने किस बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद लिए

कमर, झुक कर कमान हो चुकी होगी नाक एड़ियों को छू रही होंगी हम कीड़ों - मकोड़ों की तरह रेंग रहे होंगे ज़मीन पे सूरज हमारी हमारी पीठ पर तांडव कर रहा होगा हम रोना चाह के भी रो नहीं पा रहे होंगे कुछ बहु बली अट्ठास कर रहे होंगे फिर भी हम ज़िंदा होंगे न जाने किस बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद लिए मुकेश इलाहाबादी --------------------------

चाँद पे आदमी के कदम

चाँद पे आदमी के कदम पड़ चुके हैं अब वो अपने बूट से उसके धड़कते सीने पे दौड़ेगा चाँद को भी धरती की तरह रौंदेगा लोहा, बॉक्साइट, सोना चाँदी और तरह तरह के खनिज निकालेगा  अपने रहने लायक जगह बनाएगा और फिर ढेर सारा धुँवा और ज़हर उगलेगा एक दुसरे का क़त्ले आम करेगा पूरे चाँद को हथियाने के लिए चाँद को लहू लुहान करेगा तब चाँद की उजली उजली धरती लाल हो जाएगी उसके खूबसूरत चेहरे पे सिर्फ धब्बे ही धब्बे रह आएंगे और फिर धीरे धीरे चाँद चाँद  न रह कर बड़ा सा बदसूरत धब्बा रह जाएगा एक पिंड भर रह जाएगा - आसमान पे लटकता हुआ और तब बच्चे उसे चंदा मामा नहीं कहेंगे हम चाँद पे कविता नहीं लिखेंगे औरतें व्रत रख के चलनी से चाँद को नहीं देखेंगी मुकेश इलाहाबादी --------------

एक ही नासिका के दो स्वर हैं

एक ही नासिका के दो स्वर हैं तुम चंद स्वर मै सूर्य स्वर एक ही जिस्म के दो हिस्से हैं तुम बायाँ और मै दाँया मुकेश इलाहाबादी ---

क्यूँ ,

क्यूँ , सब कुछ अनावृत कर देती हो मेरे समक्ष फिर क्यूँ छुपाए रखती हो ? मुझसे अपने दुखः अपनी तकलीफ अपने घाव अपना पहला प्यार मुकेश इलाहाबादी -----

बतियाती है - हम दोनों के बीच,

तुम , मुझसे कुछ नहीं बोलती मै- तुमसे कुछ नहीं कहता फिर भी, तुम्हारा अनकहा सुन लेता हूँ तुम मेरा मौन समझ लेती हो ये कौन सी भाषा है ? जो बोलती है बतियाती है - हम दोनों के बीच, मुकेश इलाहाबादी ---------------- बहुत बोलती हो मै, बहुत लिखता हूँ  मै - तुम्हे नहीं सुनता तुम - मुझे नहीं पढ़ती फिर भी हम तुम एक दूजे को पढ़ लेते हैं एक दूजे को सुन लेते हैं ये कौन सी भाषा है ? जो बोलती बतियाती है हम दोनों के बीच ? मुकेश इलाहाबादी ------------

ये कौन सी भाषा है ?

तुम , मुझसे कुछ नहीं बोलती मै- तुमसे कुछ नहीं कहता फिर भी, तुम्हारा अनकहा सुन लेता हूँ तुम मेरा मौन समझ लेती हो ये कौन सी भाषा है ? जो बोलती है बतियाती है - हम दोनों के बीच, मुकेश इलाहाबादी ----------------

ये कौन सी भाषा है ?

तुम बहुत बोलती हो मै, बहुत लिखता हूँ  मै - तुम्हे नहीं सुनता तुम - मुझे नहीं पढ़ती फिर भी हम तुम एक दूजे को पढ़ लेते हैं एक दूजे को सुन लेते हैं ये कौन सी भाषा है ? जो बोलती बतियाती है हम दोनों के बीच ? मुकेश इलाहाबादी ------------

उलाहना

तेरा उलाहना सच है  रे ,,,,,,,, मै तुझे याद नहीं करता (ख़ुद से ख़ुद को कौन याद करता है ? री पगली ) (पर, ये भी सच है - तुझे बहुत मिस करता हूँ - सुमी ) मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

बोलती हुई आँखे, बतियाता हुआ चेहरा तेरा

बोलती हुई आँखे, बतियाता हुआ चेहरा तेरा बुलबुल की कूक सा चहकता हुआ चेहरा तेरा भूल के दुनिया जहान मेरे ज़ेहन में रहता है शुबो - शाम सोचूँ मै  दूधिया सा चेहरा तेरा मुकेश इलाहाबादी --------------------------

तुम्हे क्या मालूम !

एक  ----- तुम्हे क्या मालूम ! तुम्हारे  आने की उम्मीद में आज भी   प्रतीक्षा रत हैं मेरे घर की डेहरी / आँगन  और तुलसी चौरा  दो  ----  तुम्हे क्या मालूम ! तुम्हारे न आने से  लौट जाता है बसंत  मेरे द्वार से, आते - आते  तीन  ------ तुम्हे क्या मालूम ! तुम्हारी  एक हल्की सी  चितवन भी  दे जाती है शीतल एहसास  मेरे धधकते उत्ताप को  मुकेश इलाहाबादी --

भीड़ बुलाएँ, उठो मदारी

भीड़ बुलाएँ, उठो मदारी खेल दिखाएँ, उठो मदारी खाली पेट जमूरा सोया चाँद उगाएँ, उठो मदारी रिक्त हथेली नई पहेली फिर सुलझाएँ, उठो मदारी अन्त सुखद होता है दुख का हम समझाएँ, उठो मदारी देख कबीरा भी हँसता अब किसे रूलाएँ, उठो मदारी pradeep kant kee gazal kavita kosh se saabhar