अढ़ाई बूँद

हर,
रोज़ अढ़ाई बूँद अमृत की
पीला जाती हैं तुम्हारी यादें
और एक बार फिर
मै, जी जाता हूँ
मरते - मरते

मुकेश इलाहाबादी ----

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