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Showing posts from March, 2019

"मास " का फूल

वह चम्पा चंपा तो नहीं पर उसका नाम "चम्पा" हो सकता है वो गुलाबी नहीं पर उसका नाम गुलाबो हो सकता है वो गेंदा जैसी भी नहीं  पर उसका नाम गुलाबो भी हो सकता  है वैसे वो एक अलग प्रजाति का फूल होती है जो  "मास " का फूल होता है जिसका रंग चम्पा जैसा होता है गाल गुलाब से होते  हैं हँसी गेंदा सी होती है जिसकी खिलने के पहले ही खुशबू देवता - दानव और सभी मनुष्यों तक पहुंच चुकी होती है कोइ मानुष उसे तोड़ अपने गुलदान में लगाना चाहता है कोइ देवता इस अभिलाषा में होता है कि ये फूल मुझे भी चढ़ाया जाए तब तक कोइ दानव उस मास के फूल को तोड़ के रौंद चूका होता है या गुलदान में भी सजा तो वो मानुष उसे दो चार दिन बाद भूल चूका होता है कई बार ये "हाड मास " का फूल सोचता है काश मै न ही खिला होता पर फूल का खिलना न खिलना उसके हाथ में कहाँ होता है मुकेश इलाहाबादी ------------------

लोग खुश हैं हीरे मोती नगीने ले कर

लोग खुश हैं हीरे मोती नगीने ले कर हम इन सब से रईस तेरी यादें ले कर हमने तेरी तस्वीर सीने में छुपा ली है ज़माना फिर रहा चाँद सितारे ले कर खरीद लाए हैं लोग सूरज घरों के लिए  हम तो लौटे तेरी हँसी के उजाले ले कर मुकेश इलाहाबादी --------------------

अगर कोई तुमसे नाराज़ न होगा

अगर कोई तुमसे नाराज़ न होगा  समझ लेना उसको प्यार न होगा  तुम्हारे सच को भी झूठ समझेगा  जिसको तुम पर एतबार न होगा   कोइ छेड़छेड़ क्यूँ हर बार बोलेगा  अगर वो  तेरा  तलबगार न होगा  कोई भला तुमसे कुछ मांगेगा क्यूँ  जब तक तुमपे इख्तियार न होगा  रूठ के जाए फिर लौट कर न आए  समझ लेना वो सच्चा यार न होगा  मुकेश इलाहाबादी ----------------

जाने क्या सोच के हम आप की बेरुखी सह जाते हैं

जाने क्या सोच के हम आप की बेरुखी सह जाते हैं न आप से गुस्सा हो पाते हैं न आपको छोड़ पाते हैं मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

दिल मोम होता पिघला के दूसरा बना लेते

दिल मोम होता पिघला के दूसरा बना लेते टूट जाता तो किसी और से दिल लगा लेते  तुम्हारे पास बहुत बहाने हैं हंसने हंसाने को हमसे भी कभी मिलते हम भी हंस हँसा लेते कई किस्से तुम्हारे पास हैं कई मेरे पास भी मिलो बैठो अपना सुख दुःख सुन सुना लेते ये बेहद की बेरुखी अच्छी नहीं लगती  मुक्कू नाराज़गी वजह बताते हम हरगिज़ मना लेते इतने नज़दीक आ के झटके से तुम हट गईं अगर कुछ और पास आ जाते तो बोसा लेते मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

हवा में खुशबू फ़िज़ाओं में रंग भर जाते हैं

हवा में खुशबू फ़िज़ाओं में रंग भर जाते हैं आप आते हो तो हम खुशी से झूम जाते हैं पहले हमको स्याह रंग से बड़ी मुहब्बत थी आप से मिल के गुलाबी और लाल भाते हैं असल वज़ह तो हमको मालूम नहीं मुकेश आप के जाने के बाद देर तक मुस्कुराते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------------

परिन्दें कुछ पिंजड़ों में कुछ घोंसलों में उदास बैठे हैं

परिन्दें कुछ पिंजड़ों में कुछ घोंसलों में उदास बैठे हैं जब से जंगल जमीन और आसमा  रेहन रखे गए हैं चोरी -डकैती - राहजनी उसी तरह बदस्तूर जारी है हाकिम कहता है हमने घर - घर चौकीदार रक्खे हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

जाने क्या सोच के

जाने क्या सोच के हम आप की बेरुखी सह जाते हैं न आप से गुस्सा हो पाते हैं न आपको छोड़ पाते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

कभी लाल कभी गुलाबी तो कभी हरा हो जाता है

कभी लाल कभी गुलाबी तो कभी हरा हो जाता है प्यार में होती हो तो तेरा रंग और निखर जाता है कॉलेज नहीं स्कूल नहीं एक भी यूनिवर्सिटी नहीं फिर ये शोख़ियाँ ये अदाएँ तुम्हे कौन सिखाता है तंत्र नहीं मन्त्र नहीं कोइ टोना - टोटका भी नहीं क्या वज़ह है हर शख्स तेरे जादू में आ जाता है जब भी देखा तुझे खामोश और गुमशुम ही देखा रात करवटें बदलते नींद में कौन कुनमुनाता है  मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

उदास दोपहर

वो एक उदास दोपहर थी नहीं -नहीं वो एक उदास शाम थी नहीं नहीं वो एक उदास रात थी खैर छोड़ो क्या फर्क पड़ता है वो उदास दिन था - उदास साँझ थी या रात थी ये तो तय है वो एक उदास लम्हा था अजीब सी मनहूसियत थी वज़ूद में इक बेचैनी सी तारी रहती थी जो उस वक़्त भी बहुत घनी भूत हो के छाई थी "मै" रोज़ सा एक बी के नोटिफिकेशन पेज को स्क्रॉल कर रहा था सहसा - एक पिक पे नज़र आ के ठिठक गयी खूबसूरत आँखे - भरे -भरे गाल प्यारे मूँगिया होठ - बस - यूँ ही आदतन कह लो या न जाने किस अंतःप्रेरणा वश उंगली - "सेंड फ्रेंड रिक्वेस्ट " पे अनायास दब गयी और ये महज़ एक साधारण बात समझ अपनी याददास्त के कोने में रख के भूल भी चुका था पर मुझे क्या मालूम आज मैंने - आभासी दुनिया में उस बटन को दबाया है - जो बहुत बड़ा फलक बनने जा रहा है। खैर ----- दो चार दिन बाद  उस गुलाबी गालों वाली ने मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। मेरी कुछ रचनाए उसने पसंद की - मैंने वाल पे धन्यवाद दिया मैसेंजर पे - औपचारिक बातें हुई मैंने - अपनी एक कहानी भेजने और प्रतिक्रिया के लिए कहा - उसने "हाँ " बोला मैंन...

भक्ति मार्ग

कलयुग में ईश्वर प्राप्ति का सबसे सहज और सरल उपाय - हमारे शास्त्रों में "भक्ति मार्ग " को ही माना है। कलयुग में -  हवा - पानी - भोजन, आचार - विचार, रहन - सहन  सब कुछ अशुद्ध और अव्यवस्थित हो चुका होता है  और ऐसे में ईस्वर प्राप्ति के लिए योग - जप - तप - ध्यान या अन्य मार्ग बहुत कठिन हो चुके होते हैं - सच्चे और सिद्ध गुरुओं का अकाल हो चूका होता है - ऐसे में भक्ति मार्ग ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्व इश्वर को सहज व् सरल तरीके से प्राप्त कर सकता है - भक्ति मार्ग एक ऐसा मार्ग है - जिसमे किसी गुरु - साथी - या समूह की ज़रुरत नहीं होती है - मनुष्य अकेले ही भक्ति कर कर के इश्वर को प्राप्त कर सकता है  और पूर्व में भी कइयों ने पाया है - इसी कलियुग में -तुलसी दास , मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु , रामकृष्ण परमहंस - राम कृष्ण जैसे महापुरुषों ने भक्ति मार्ग के द्वारा न स्वयं अपना उद्धार किया बल्कि - हज़ारों हज़ार लोगों का उद्धार किआ और उनके बताए मार्ग में चल कर या उनसे प्रेरणा ले कर आज भी मनुष्य लाभान्वित हो रहा है। भक्ति के लिए - सिर्फ और सिर्फ - सम्पूर्ण समर्पण और शुद्...

तुमसे मतलब

हम  पिछवाड़े से  प्रजातंत्र की जगह  पूंजीतंत्र लायेंगे  तुमसे मतलब  हम स्वाभिमान की  सूखी प्याज रोटी की जगह  गुलामी की दूध रोटी खायेंगे  और कुत्ते सा पूँछ हिलाएंगे  तुमसे मतलब   हम हवा - पानी  देवी देउता, आस विस्वास सब बेच देंगे   तुमसे मतलब  चोरों को चौकीदार कहें  तुमसे मतलब ? हम छद्म राष्टवाद को देशभक्ति कहें  तुमसे मतलब  मुकेश इलाहाबादी ----------

नाव

तुम्हारे नाम का ख़त लिख के नाव बना दी है कागज़ की और - बहा दिया है वक़्त की नदी में - ये सोच कर शायद ये थपेड़े खा खा कर किसी दिन तुम तक पहुंच ही जाये और तुम इसपे बैठ के आ जाओ मुझ तक फिर हम करें केलि - देर तक अनंत काल तक मुकेश इलाहाबादी -------------

मस्सा

ये जो तुम्हारे बाएं वाली गुलू - गुलू गाल पे छोटा सा - नन्हू सा भूरे रंग का मस्सा है थोड़ा काला थोड़ा भूरा क्यूट सा बस - जी चाहता है अपने होठो को गोल - गोल करूँ और रख दूँ इस नन्हू से शरारती मस्से पे हमेसा हमेसा के लिए मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

जाने क्यूँ

ईश्वर से कुछ माँगते वक़्त तुम्हारा ही ख़्याल क्यूँ आता है ? मद्धिम - मद्धिम हवा चल रही हो और मौसम खुशगवार हो तो ये मन तुम्हारा ही साथ क्यूँ चाहता है ? सुःख - दुःख तुमसे ही बतियाने को जी क्यूँ चाहता है ? मौसम की पहली बारिस में तुझ संग भीगने की जी करता है जाने क्यूँ होली में सबसे पहले तेरे ही गालों पे गुलाल मलने का  जी क्यूँ  करता है ? सुमी ! क्या तुझ संग भी ऐसा कुछ होता है ???? मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

जब संकल्पवान हो जाते हैं

जब संकल्पवान हो जाते हैं  तब हम बलवान हो जाते हैं  राम को दिल में बसा लें तो  हम भी हनुमान हो जाते हैं  देश महान हो जाता है जहाँ  इंसान चरित्रवान हो जाते हैं  अगर बाग़ में उल्लू बैठे हो  तो बाग़ वीरान हो जाते हैं   जहाँ ज़िंदा कौमे नहीं रहती  वे शहर शमशान हो जाते हैं  मुकेश इलाहाबादी ----------