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Showing posts from September, 2014

माना दीवारें बतियाती नहीं

दीवारें धूप छाँह झेलती तो हैं  हमारा दुःख दर्द सुनती तो हैं सीढ़ियां मंज़िल नहीं होती मगर उम्मीदे मंज़िल तो हैं तसव्वुर से जी नहीं भरता ख्वाब से रातें कटती तो हैं चाहे कितनी भी लम्बी हो शब -ऐ -हिज़्र कटती तो है लोग मसल देते हैं फिर भी कलियाँ रोज़ खिलती तो हैं मुकेश इलाहाबादी -----------

दुनिया ने जीने न दिया

दुनिया ने जीने न दिया प्यार ने मरने न दिया दरिया में पानी कम था उसने भी डूबने न दिया अज़नबियत हावी रही हया ने बोलने न दिया रास्ते की दुश्वारियों ने तुझ तक आने न दिया फ़लक़ ने तो बुलाया था कफ़स ने उड़ने न दिया मुकेश इलाहाबादी ----

दिल हवेली जिस्म गुम्बद है

दिल हवेली जिस्म  गुम्बद है अब तो  यहां सिर्फ खंडहर है फक्त घुप्प अन्धेरा मिलेगा बाकी चमगादड़ व कबूतर हैं जहां रौनक हुआ करती थी वहाँ अब उदासी के मंज़र है कभी हमारा भी ज़माना था ये बात इतिहास में भी दर्ज़ है  मुद्दतों से कोई आया ही नहीं मुकेश तो बीता हुआ कल है मुकेश इलाहाबादी -----------

अँधेरा सन्नाटा और उल्लू की आवाज़ है

अँधेरा सन्नाटा और उल्लू की आवाज़ है देखते जाओ ये तो बरबादी का आगाज़ है अजब अहमक हो यहां गुलशन ढूंढते हो ? देखते नहीं, हर घर और दिल में बाज़ार हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

समंदर के सीने में सनसनाहट है

समंदर के सीने में सनसनाहट है ज़मीं से आसमां तक हरहराट है हैं शहर का आलम धुआं धुआं सा अजब बेचैनी सी और घबराहट है देखता हूँ इन परिंदों को उड़ता हुआ लगता है दिल में भी छटपटाहट है होगा हमारी बस्ती में अन्धेरा घना तुम्हारे शहर में तो जगमगाहट है तुम्हारे घर से लौटे हैं मियाँ मुकेश क़दमों में रिन्द की लड़खड़ाहट है मुकेश इलाहाबादी --------------------

ये दिल ज़रा सी धूप ज़रा सी छाँव मांगे है

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ये दिल ज़रा सी धूप ज़रा सी छाँव मांगे है इक मासूम चेहरा ज़ुल्फ़ों की ठाँव मांगे है कि परिंदों के पर भी शरमा जाएं हमसे हवा से भी तेज़ रफ़्तार वाले पाँव मांगे है कागज़ की हो काठ की हो या फूलों की हो किसी दरिया में न डूबे ऐसी नाव मांगे है शहर से जब भी लौट कर आऊं मुकेश तो वही पनघट वही बरगद वही गाँव मांगे है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ज़माने के लिए ये बड़ी हैरत की बात है

ज़माने के लिए ये बड़ी हैरत की बात है  तुम हो हमारे साथ किस्मत की बात है कोई छोड़ कर मुहब्बत दौलत को चाहे ये तो अपनी -अपनी नियत की बात है तमाम लोग बेवफाई करके निकल गए  फिर भी चुप रहता है आदत की बात है जिस्म पे तमाम ज़ख्म खा कर भी वो सच पे अड़ा है, बड़ी हिम्मत की बात है हर हाल में वो हँसता और मुस्कुराता है कलन्दरी मुकेश के तबियत की बात है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

चोट पर चोट खाते और मुस्कुराते रहे

चोट पर चोट खाते और मुस्कुराते रहे ज़ख्म हँसते रहे हम खिलखिलाते रहे तुम चाँद हो तुम्हारी अठखेलियां देख फलक के सितारे भी जगमगाते रहे तुम हमसे बेवज़ह रूठ कर चल दिए फिर देर तक हम तुमको पुकारते रहे देर तक उदासियों ने घेरा था उस दिन फिर इक उदास नज़्म गुनगुनाते रहे जानता हूँ तुम हरगिज़ नहीं लौटोगी दिल को झूठी तसल्ली से बहलाते रहे मुकेश इलाहाबादी -----------------------

ज़िंदगी भर यही करते रहे

ज़िंदगी भर यही करते रहे दिल रोया हम हँसते रहे मिली सड़क अंगारों  की   पाँव नंगे हम चलते रहे कभी तो मंज़िल मिलेगी सोच कर यही बढ़ते रहे आज भी अजनबी  है वो रोज़ जिससे मिलते रहे कभी तो कोई सुनेगा ? ग़ज़ल रोज़ लिखते रहे मुकेश इलाहाबादी ----------

आओ प्यारा सा घर बनाएं

आओ प्यारा सा घर बनाएं फिर फूलों से  उसे सजाएं हो बस्ती से दूर कहीं घर औ हम सौदा लेने शहर को आएं दो प्यारे प्यारे फ़ूल  खिलें फूल हँसे और हम मुस्काएं अपनी छोटी सी क्यारी में गेंदा और हर श्रृंगार लगाएं जब भी दुःख सुख आये तो इक दूजे का साथ निभाएं मुकेश इलाहाबादी ---------

लगा के मलमल का परदा सोचतें हैं वो

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लगा के मलमल का परदा सोचतें हैं वो रोक लेंगे चाँदनी को ज़माने की नज़र से ख़ुद को चिलमन में छुपा के सोचते हैं वो खुशबू ऐबदन  छुपा लेंगे ज़माने की नज़र से   मुकेश इलाहाबादी -------------------------

गूंगो को ज़ुबान दिया जाए

गूंगो को ज़ुबान दिया जाए शेरों को लगाम दिया जाए अधूरे रह गए है जो ख्वाब उन्हें भी मुकाम दिया जाए कफ़स में जो रह रहे हैं उन्हें हवाके लिए बाम दिया जाए रिन्द कोई भी प्यासा न रहे सभी को जाम दिया जाए फुटपाथ पे न सोयेगा कोई सब को मकान दिया जाए सच और प्रेम का राज़ होगा शहर में एलान किया जाए मुकेश इलाहाबादी -------

पक्के घरों में तुम अपनापन न पाओगे

पक्के घरों में तुम अपनापन न पाओगे कच्ची दीवारों का सोंधापन न पाओगे आशिक़ तो तुमको मिल जाएंगे बहुतेरे मज़नू सा मगर दीवानापन न पाओगे कुछ पाओ चाहे न पाओ पर तुम कभी गरीब इंसान में बेगानापन न पाओगे  नाज़ों आंदज़ वाले देखे होंगे तुमने बहुत पर मेरे मेहबूब सा बाँकपन न पाओगे ढूंढोगे तो तमाम खामियां मिल जाएँगी मुकेश में लेकिन कमीनापन न पाओगे मुकेश इलाहाबादी -----------------------

क्षितिज में सूरज निकला है अभी अभी

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क्षितिज में सूरज निकला है अभी अभी परिंदों ने भी बसेरा छोड़ा है अभी अभी किरणे समंदर के पानी से सतरंगी हुईं धरती पे जागी है ज़िदंगी अभी - अभी मुकेश इलाहाबादी ---------------------

आग सा दिन बर्फ सी रात है

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आग सा दिन बर्फ सी रात है बाकी तो ग़म की बरसात है आये हो तो कुछ देर बैठो भी अरसे बाद की मुलाक़ात है मै तनहा सूरज तुम,चाँद हो  साथ में सितारों की बरात है कुछ तुम कहो कुछ हम कहें करना चाहो तो बहुत बात है वक़्त के साथ तुम बदल गए तुममे अब कंहाँ वो बात है ? मुकेश इलाहाबादी -----------

हर लफ़्ज़ को धार देना होगा

हर लफ़्ज़ को धार देना होगा ख़ुद को तलवार करना होगा ये मज़नू बनने का वक़्त नहीं  हमें राणा प्रताप बनना होगा पूरा समाज ही भ्रष्ट हो जाये   उसके पहले ही सोचना होगा क़यामत आये इसके पहले  धर्म की तरफ लौटना होगा एक न एक दिन ज़माने को मुकेश की बात सुनना होगा मुकेश इलाहाबादी ----------

अंधेरी रात लिए बैठे हैं

अंधेरी रात लिए बैठे हैं चांद की आस लिए बैठे हैं रातों को नींद नहीं आती तेरा ही ख़ाब लिए बैठे हैं ग़ज़ल पूरी नहीं हो रही सिर्फ मत्ला लिए बैठे हैं आओ  कोई गीत गायें देर से साज़ लिए बैठे हैं अपने  इस तनहा घर में तुम्हारी याद लिए बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी -------

हाँ, हम ज़िंदगी भर गुनाह करते रहे

हाँ, हम ज़िंदगी भर गुनाह करते रहे हाँ - हाँ  मुहब्बत करते रहे करते रहे कभी सहरा तो कभी दश्ते तीरगी रही उम्र भर तो सफर करते रहे करते रहे कभी रुसवाई तो कभी संगसारी मिली ईश्क में हर ज़ुल्म सहते रहे सहते रहे चाहता तो बहुत कुछ कह सकता था पर हम चुपचाप सुनते रहे सुनते रहे मुकेश हमें तो यही तरीका रास आया दर्द कुछ तरह बयां करते रहे करते रहे मुकेश इलाहाबादी ----------------------- -

तू न सही तेरी ये आँखें बोलती हैं

तू न सही तेरी ये आँखें बोलती हैं सादगी तेरी सर चढ़ के बोलती है चम्पई -चम्पई रंग,फूल सा चेहरा तितली के पंख सी पलकें बोलती हैं जब तुम कुछ नहीं कह रही होती हो तब तुम्हारी मरमरी बाहें बोलती हैं तुम हमसे गूफ्तगू नहीं करतीं हो तुम्हारी महकती साँसे बोलती हैं जब तन्हाइयों में दिल नहीं लगता मुकेश हमसे तुम्हारी यादें बोलती हैं मुकेश इलाहाबादी ----------------------

तुम कंही भी जाओगे

तुम कंही भी जाओगे  लौट के यहीं आओगे देखना सच जीतेगा अंजाम यही पाओगे बर्फ हूँ मै गल जाऊंगा तुम एक नदी पाओगे मेरी खामोश घाटी में अपनी आवाज़ पाओगे जब लौट के आओगे मुझको यहीं पाओगे मुकेश इलाहाबादी --

लोग सुन रहे हैं कहानियां गली -गली

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लोग सुन रहे हैं कहानियां गली -गली मशहूर है मेरी बदनामियाँ गली-गली ज़माना भी न मिटा पायेगा मेरा वज़ूद कि फ़ैली है मेरी निशानियाँ गली- गली बेशक़ बेदखल करके खुश हैं कुछ लोग मेरे नाम पे फ़ैली है उदासियाँ गली गली मेरा कुशूर था सच बोलने भर का, पर   ख़िलाफ़ में लगी हैं तख्तियां गली-गली जब से विरोध में उठा है हाथ मुकेश का तानाशाह ने बढ़ा दी शख्तियाँ गली-गली   मुकेश इलाहाबादी ------------------ ------

लोग सुन रहे हैं कहानियां गली -गली

लोग सुन रहे हैं कहानियां गली -गली मशहूर है मेरी बदनामियाँ गली-गली ज़माना भी न मिटा पायेगा मेरा वज़ूद कि फ़ैली है मेरी निशानियाँ गली- गली बेशक़ बेदखल करके खुश हैं कुछ लोग मेरे नाम पे फ़ैली है उदासियाँ गली गली मेरा कुशूर था सच बोलने भर का, पर  ख़िलाफ़ में लगी हैं तख्तियां गली-गली जब से विरोध में उठा है हाथ मुकेश का तानाशाह ने बढ़ा दी शख्तियाँ गली-गली  मुकेश इलाहाबादी ------------------------

तेरे आने की उम्मीद में अब तक ज़िंदा हूँ ,,

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तेरे आने की उम्मीद में अब तक ज़िंदा हूँ ,, वर्ना ये साँसे कब की रुक गयी होतीं मुकेश मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

तुमसे मै सच कहता हूँ

तुमसे मै सच कहता हूँ दर्द के घर में रहता हूँ इन सारे ज़ख्मो से अब रातों दिन बातें करता हूँ अपनी हर धड़कन में तेरी सरगम सुनता हूँ दिन कैसे भी गुज़रें पर ख्वाब सुनहरे बुनता हूँ इश्क़ आग का दरिया है मै पाँव बरहना चलता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------

यूँ तो हम बैठे थे घर पे अपनी मस्ती में मुकेश

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यूँ तो हम बैठे थे घर पे अपनी मस्ती में मुकेश देखा जो तुझे कारवां में तो साथ हम भी हो लिए मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

हैरान है देखकर आईने में अपनी ही सूरत

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हैरान है देखकर आईने में अपनी ही सूरत भला जहान में है कौन हमसे भी खूबसूरत ? मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

ताज़ा गुलाब सा खिले -२ लगते हो

ताज़ा गुलाब सा खिले -२ लगते हो सुबह की ओस में नहाए  दिखते हो तुम्हारे बदन में अजब सी खुशबू है तुम भी चन्दन का बदन रखते हो यूँ तो ज़माने में बहुत से लोग मिले पर तुम मुझे सबसे अच्छे लगते हो दोस्त किसी दिन मेरे घर तो आओ और ये बताओ तुम कंहाँ रहते हो ? मै मुहब्बत की ग़ज़ल कहता हूँ,क्या  कभी तुम मेरी भी ग़ज़ल सुनते हो ? मुकेश इलाहाबादी --------------------

ये तो ज़माने की चाल थी जो हो गए हम जुदा

ये तो ज़माने की चाल थी जो हो गए हम जुदा मुकेश वरना न तुम बेवफा न हम बेवफा मुकेश इलाहाबादी ----------------------- ----------

तुम्हारे आने से मौसम खुशगवार हो गया

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तुम्हारे आने से मौसम खुशगवार हो गया काम - काज का दिन भी इतवार हो गया कहा था तुमने मंगल के हाट में आओगी दिन गिन रहा हूँ कि आज गुरुवार हो गया मुकेश हिज़्र में तुम्हारे दिन रात नहीं कटते शुक्र को मिले थे हम आज सोमवार हो गया मुकेश इलाहाबादी ------------------------------  

ज़िंदगी के लिए,

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ज़िंदगी के लिए, हरारत बचाए रक्खा है तेरी यादों का अलाव जलाए रक्खा है जो साल गुज़ारा है संग - साथ तेरे   वो कॅलेंडर आज भी लगाए रक्खा है तू बाम पर आये या न आये, तेरे दर पे आने का सिलसिला बनाए रक्खा है रिश्तों के गुल मुरझा गए तो क्या ? वो फूल आज भी सजाए रक्खा है    मुकेश इलाहाबादी -------------

ये सूखा हुआ मौसम शिकायत कर रहा है घटाओं से

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ये सूखा हुआ मौसम शिकायत कर रहा है घटाओं से घटाएं जो क़ैद होके रह गयी हैं तुम्हारी इन ज़ुल्फ़ों में देख कर तुम्हारी आखों की लरज़ती बहती हुई नदी समंदर भी है खफातेरी आखों की दरिया की मौज़ों से मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

चाह कर भी बोलने न दिया

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हया ने लब खोलने न दिया तूफां का ज़ोरकुछ  इतना हवा के संग डोलने न दिया पलट के उसने देखा तो था ज़िद ने उसे रोकने न दिया ज़िदंगी की मसरूफियत ने तेरे बारे में सोचने न दिया उदास तो हम भी थे मुकेश तेरे ग़म ने हमें रोने न दिया मुकेश इलाहाबादी ----------

ज़माने को कुछ कर दिखाना चाहता है

गिरह ---- ज़माने को कुछ कर दिखाना चाहता है परों में बाँध कर पत्थर उड़ाना चाहता है दिन ढलते उदासी ने आँचल फैला लिए  ऐसे में वो उदास नज़्म गाना चाहता है तुम्हारे इश्क़ में वो शायर बन गया, अब  सुबहो शाम तुमको गुनगुनाना चाहता है मुफलिसी ने उसको मज़बूर कर दिया वो तुम्हारे लिए तोहफा लाना चाहता है तुमको गैरों से ही फुरसत नहीं मिलती तुम्हारे साथ कुछ पल बिताना चाहता है मुकेश इलाहाबादी ------------------------ ज़नाब अजय एस अज्ञात की खूबसूरत ग़ज़ल से मिसरा ए सानी लिया गया है - 'परों में बाँध कर पत्थर उड़ाना चाहता है '

दिल भी उनका, धड़कन भी उनकी, बेचैनी भी उनकी

दिल भी उनका, धड़कन भी उनकी, बेचैनी भी उनकी जो पूछता हूँ हाल दिल तो कहंते हैं 'हमें कुछ मालूम नहीं' बिछड़ते वक़्त हमने जो पूछा 'अब कब मुलाक़ात होगी ? चल दिए हंस के कहते हुए 'मुकेश,हमें कुछ मालूम नहीं ' मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------

अच्छी हो या कि बुरी कट ही जाएगी

अच्छी हो या कि बुरी कट ही जाएगी ज़िदंगी का क्या है ? गुज़र ही जाहेगी सुबह से लेकर शाम तक चल रहे हैं तो कभी न कभी मंज़िल मिल ही जाएगी तनहा हैं तो तनहा ही रह लेंगे उम्रभर तबियत का क्या है बहल ही जाएगी आखिर कब तक सिर पटकती रहेंगी उदास हो के उदासी भी लौट ही जाएगी  उम्र सारी मुफ़्लासी में गुज़री तो क्या ? मुकेश दो गज़ ज़मीन मिल ही जाएगी मुकेश इलाहाबादी ------------------------

गर इक बार भी कह दिए होते

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  गर इक बार भी कह दिए होते तुम्हारी राह में बिछ गए होते तख्ते -ताउस और ताज़ क्या चाँद -सितारे भी ला दिए होते तुम्हारी इन उदास पलकों पे काजल बन के सज गए होते ज़रा सा इशारा तो किया होता हम तेरे दर से ही चले गए होते तुम्हारी इक मुस्कान के लिए मुकेश कुछ भी कर गुज़रे होते मुकेश इलाहाबादी --------------

नदी पे इक पुल बनाया जाए

नदी पे इक पुल बनाया जाए दो साहिलों को मिलाया जाए दरख़्त सूख चुके हैं रिश्तों के आ उन्हें हरा भरा किया जाए प्यार मुहब्बत से मिलजुल के आपसी रंजिश दूर किया जाए तुम्हारी खुशियों भरी रात, मेरी उदास ग़ज़लें सुना सुनाया जाए मुकेश आये हो तो कुछ देर बैठो साथ - साथ चाय तो पिया जाए मुकेश इलाहाबादी ---------------

साँझ से ही हम नदिया किनारे बैठे रहे

साँझ से ही हम नदिया किनारे बैठे रहे दरिया के पानी में छप -छप करते रहे ख्वाब थे हमारे आवारा बादलों की तरह कई - कई रूपों में सजते रहे संवरते रहे दरिया में लहरें आती रही औ जाती रहीं हम भी अपनी तरह डूबते रहे उतरते रहे इक पपीहा चाँद की  मुहब्बत में है देर से हम उसी की टेर को रह रह के सुनते रहे हर सिम्त चाँद ने चांदनी चादर बिछा दी मुकेश उजली चादर में करवट बदलते रहे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

सांझ होते ही चहचहाने लगे

सांझ होते ही चहचहाने लगे पंछी अपने नीड में जाने लगे इधर रात गहराने लगी उधर चाँद - सितारे जगमगाने लगे नींद पलकों में डेरा जमा चुकी ख्वाब अपने पंख फैलाने लगे जैसे - जैसे रात गहरा रही है तुम मुझे और याद आने लगे जो ज़ख्म दिन में सो गए थे रात होते ही मुस्कुराने लगे मुकेश इलाहाबादी -----------

दिल ही दिल में दहक रहे हैं

दिल ही दिल में दहक रहे हैं दर्द के आंसू छलक रहे हैं जाने कितने ग़म ले कर पी कर हाला बहक रहे हैं ये तो तेरी महफ़िल है जो पल दो पल को चहक रहे हैं जीवन अपना उजड़ा गुलशन फिर भी फूलों सा महक रहे हैं इक मुद्दत के बाद मिले हो सारे अरमां मचल रहे हैं मुकेश इलाहाबादी -----------

बुते संगमरमर में ख़ुदा ढूंढ रहे हो

GIRAH------------------------------ बुते संगमरमर में ख़ुदा ढूंढ रहे हो आईने में पत्थर की अदा ढूंढ रहे हो यंहा सभी पत्थर दिल रहा करते हैं यार तुम भी मुहब्बत कहाँ ढूंढ रहे हो जिनकी आखों में रेत् के समंदर हैं उन आखों में अपना जहाँ ढूंढ रहे हो यूँ शहर -शहर दर-ब-दर भटकते हुए अपनी मुहबबत का पता ढूंढ रहे हो ? जो इक बार धोखा दे चुका है तुम्हे मुकेश तुम उसी में वफ़ा ढूंढ रहे हो मुकेश इलाहाबादी --------------------- ‘MISRA-E-SANI’... आईने में पत्थर की अदा ढूंढ रहे हो Janaab Manohar Manu Gunavi Sahib KI KHOOBSURAT GHAZAL KE EK SHER SE LIYAA GAYAA HAI .....

यूँ तो कौन रोता है उम्रभर किसी के बिछड़ जाने पर

यूँ तो कौन रोता है उम्रभर किसी के बिछड़ जाने पर ये भी सच है आज भी रो देता हूँ उसकी याद आने पर मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------

ख्वाब तो हमने भी देखे थे मुस्कुराती सुबह की

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ख्वाब तो हमने भी देखे थे मुस्कुराती सुबह की ये और बात ग़म के बादलों ने आसमाँ ढक लिया मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

मुस्कराहट कर गयी थी चुगलियां

मुस्कराहट कर गयी थी चुगलियां वर्ना हम क्या समझते खामोशियाँ ख़ुद बैठे हैं ज़नाब शुकूं से घर पर दिल पे हमारे  गिरा कर बिजलियाँ  कभी न कभी तो बाम पर आएंगे  कभी तो खोलेंगे अपनी खिड़कियाँ ज़माने से ही तुम्हे फुर्सत नहीं तो क्या सुनोगे तुम हमारी सिसकियाँ आँगन में आ- आ कर नाचती हैं साँझ उदास लौट जाती हैं रश्मियाँ  देखना झूम कर बरसेंगे एक दिन हमसे कहे गयी हैं काली बदलियाँ मुकेश इलाहाबादी ------------------

मुझसे हर राज़ बताये रखता है

मुझसे हर राज़ बताये रखता है ईश्क की बात छुपाये रखता है यूँ तो हमसे कोई पर्देदारी नहीं आदतन नज़रें झुकाये रखता है परियों की बातें फूलों के किस्से क्या-२ ख्वाब सजाये रखता है ? कोई ख़त न कोई संदेसा आया दिल है की आस लगाये रखता है होश में उसकी याद नहीं जाती पी कर ख़ुद को भुलाये रखता है मुकेश इलाहाबादी --------------

गुलाब की ताज़ा कली सा खिलते हो

गुलाब की ताज़ा कली सा खिलते हो मुस्कुराते हो तो फूल सा लगते हो रजनीगंधा के फूल झरा करते हैं जब तुम यूँ खिलखिला के हँसते हो आँगन में  तमाम मोती बिखर जाते हैं जब तुम अपने गीले गेसू झटकते हो मेरी बाहों की दश्त ऐ तीरगी में तुम चाँद सितारों सा चमकते हो   ये भोली सी सूरत प्यारी सी बातें तुम मुझे परियों के देश के लगते हो मुकेश इलाहाबादी ----------------------