माना दीवारें बतियाती नहीं
दीवारें धूप छाँह झेलती तो हैं
हमारा दुःख दर्द सुनती तो हैं
सीढ़ियां मंज़िल नहीं होती
मगर उम्मीदे मंज़िल तो हैं
तसव्वुर से जी नहीं भरता
ख्वाब से रातें कटती तो हैं
चाहे कितनी भी लम्बी हो
शब -ऐ -हिज़्र कटती तो है
लोग मसल देते हैं फिर भी
कलियाँ रोज़ खिलती तो हैं
मुकेश इलाहाबादी -----------
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