तुमसे मै सच कहता हूँ

तुमसे मै सच कहता हूँ
दर्द के घर में रहता हूँ

इन सारे ज़ख्मो से अब
रातों दिन बातें करता हूँ

अपनी हर धड़कन में
तेरी सरगम सुनता हूँ

दिन कैसे भी गुज़रें पर
ख्वाब सुनहरे बुनता हूँ

इश्क़ आग का दरिया है
मै पाँव बरहना चलता हूँ

मुकेश इलाहाबादी ------

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