चाँद पे आदमी के कदम

चाँद पे
आदमी के कदम
पड़ चुके हैं
अब वो अपने बूट से
उसके धड़कते सीने पे दौड़ेगा
चाँद को भी धरती की तरह रौंदेगा
लोहा, बॉक्साइट, सोना चाँदी
और तरह तरह के खनिज निकालेगा 
अपने रहने लायक जगह बनाएगा
और फिर ढेर सारा धुँवा और ज़हर उगलेगा
एक दुसरे का क़त्ले आम करेगा
पूरे चाँद को हथियाने के लिए
चाँद को लहू लुहान करेगा
तब चाँद की उजली उजली धरती लाल हो जाएगी
उसके खूबसूरत चेहरे पे सिर्फ धब्बे ही धब्बे रह आएंगे
और फिर धीरे धीरे चाँद
चाँद  न रह कर बड़ा सा बदसूरत धब्बा रह जाएगा
एक पिंड भर रह जाएगा -
आसमान पे लटकता हुआ
और तब
बच्चे उसे चंदा मामा नहीं कहेंगे
हम चाँद पे कविता नहीं लिखेंगे
औरतें व्रत रख के चलनी से चाँद को नहीं देखेंगी

मुकेश इलाहाबादी --------------


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