ज़िगर में इक और खंज़र उतर जाने दे

ज़िगर में इक और खंज़र उतर जाने दे
तेरे हिज़्र से तो बेहतर मुझे मर जाने दे

पतवार छोड़ दी नाव के पाल खोल दिए 
अब जिधर लहरें ले जाएं, उधर जाने दे

ईश्क़ मेरा मज़हब इश्क़ ही मेरा ईमान 
मत रोक मुझे मुहब्बत के नगर जाने दे

फूल सा खिला ज़माने भर को खुशबू दी
अब मुरझा गया हूँ, मुझे बिखर जाने दे

मेरे चाहने वाले किसी तौर मरने न देंगे
मै मर जाऊँ तब उन तक खबर जाने दे 

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

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