सौदेबाज़

उसने
मन ही मन
हिसाब लगाया

कुछ महंगे गिफ़्ट
कुछ शॉपिंग
थोड़ी बहुत आउटिंग और
रेस्टुरेंट के खर्चे के एवज़ में

महीनो मीठी - मीठी फ़ोन कॉल्स
साथ साथ घूमना
कभी थोड़ा तो कभी ज़्यदा स्पर्श सुख
कुछ यादगार चुंबन और
एक दो रातों के सुख के एवज़ में
ये सौदा बुरा नहीं था

सौदेबाज़
मन ही मन मुस्कुराया खुश हुआ
फैसला लिया, और अब -,,,,

मोबाइल से  'प्यार ' डिलीट' हो चूका था
यहाँ तक की फेस बुक, ट्विटर से भी
अनफ्रेंड व अनफॉलो हो चूका था वो 'प्यार'
क्यों की उसकी धरती पे प्रेम का
नया अंकुर उग रहा था
इस लिए ज़रूरी था
पुराने सूखते पौधे को उखाड़ फेंकना

मुकेश इलाहाबादी -------------------

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