दिन को उजाला रातों को अँधेरा नहीं मिलता

दिन को उजाला रातों को अँधेरा नहीं मिलता
अजीब शहर है यंहा कोई हँसता नहीं मिलता

दुःख दर्द अपना हर कोई बाँटना चाहता तो है
हमदर्द नहीं मिलता कोई अपना नहीं मिलता

जिधर देखो उधर ही, दर्दों ग़म के अफ़साने हैं
अफसाना ऐ मुहब्बत कोई गाता नहीं मिलता

खिलाड़ी, व्यापारी, नेता,पंडित,पुरहित मिलेंगे
रैदास सा मोची कबीर सा जुलाहा नहीं मिलता


मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------


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