सच के साँचे में ढल गया

सच के साँचे में ढल गया
मोम बनकर पिघल गया

ज़माना देखने की चाहत में
यायावर बन निकल गया

गाँव का सच्चा सीधा इन्सां
शहर की हवा में बदल गया

ज़िंदादिली उसकी ऐसी कि
ज़ख्म फूल बन खिल गया

दिल मुकेश का बच्चा था
देखकर चाँद मचल गया

मुकेश इलाहाबादी ----------

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