अब इस शहर में बचा कुछ नहीं


अब इस शहर में बचा कुछ नहीं
रंज़िशो ग़म के सिवा कुछ नहीं

खुशनुमा मौसम हुआ करता था
अब कड़ी धूप के सिवा कुछ नहीं

सिर्फ मुट्ठी भर ख़ाक मिली मुझे,
तलाश गुहर की,मिला कुछ नहीं 

यूँ तो मैख़ाना था सामने ही मेरे,,
देखता ही रह गया पीया कुछ नहीं

बेवज़ह गुलशन ढूंढते हो मुकेश
उजड़े चमन के सिवा कुछ नहीं

मुकेश इलाहाबादी --------------

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