हवा बह रही मुसलसल आग ले के,

  
हवा बह रही मुसलसल आग ले के,
तडपे है दिल मेरा तेरा ही घाव ले के
चिलचिलाती धुप बिखरी हर सिम्त
बैठा हूँ थक के यादों  की छांव ले के
जाने क्यूँ जी को भाती नहीं आवारगी
बैठ गया थक के ज़ुल्फ़ की ठाव ले के
खुश है जहां सार अपनी रंगीनियों मे
बैठा है मुकेश  यहाँ तनहा शाम ले के
मुकेश इलाहाबादी ----------------------

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