सावन भादों सा बरस गयी आँखें
सावन भादों सा बरस गयी आँखें
तेरे दीदार को तरस गयी आँखे
मुद्दतों से यँहा वीराना वीराना था
तुझे देखा तो निखर गयीं आँखे
यूँ तो निगाह में कोई और ही था
तुझे देख वंही अटक गयी आँखे
ज़रा सा उसकी तारीफ क्या की
लाज से उसकी लरज़ गयी आँखे
पलकों पे हया के हीरे- मोती थे
नज़रें मिली तो बहक गईं आँखे
मुकेश इलाहाबादी --------------
तेरे दीदार को तरस गयी आँखे
मुद्दतों से यँहा वीराना वीराना था
तुझे देखा तो निखर गयीं आँखे
यूँ तो निगाह में कोई और ही था
तुझे देख वंही अटक गयी आँखे
ज़रा सा उसकी तारीफ क्या की
लाज से उसकी लरज़ गयी आँखे
पलकों पे हया के हीरे- मोती थे
नज़रें मिली तो बहक गईं आँखे
मुकेश इलाहाबादी --------------
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