उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है

उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है
गुलशन के फूल बेरंग बेनूर नज़र आये है
इक मुद्दत के बाद हाल पुछा है जनाब ने
कि लम्बी रात के बाद सहर नज़र आये है
दूर - दूर तक रेत है तपन है और तन्हाई है
ज़िंदगी हमें मुस्किल सफ़र नज़र आये है

मुकेश इलाहाबादी --------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है