शाख से टूट कर पहले तो खुश हुआ पत्ता

शाख से टूट कर पहले तो खुश हुआ पत्ता
कुछ दूर उडता रहा फिर सूख गया पत्ता

शाख से कलियों टूटीं तो सब को बुरा लगा
सब चुप रहे जब ड़ाल से तोडा गया पत्ता

तपते सूरज ने जला कर खाक किया चमन
दिखता नही अब यहां एक भी हरा पत्ता

मुकेश  इलाहाबादी ........................

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