दिन चढे़ तू सोता है कयूं ?

दिन चढे़ तू सोता है कयूं ?
सेहत अपनी खोता है क्यू?

मेहनत से काम किया कर,
खुदी को तू रोता है क्यू ?

गर षराब सिगरेट जहर है,
फिर रोज रोज पीता है क्यूं?

सच कहने की ताब रख,
जुल्मो सितम ढोता है क्यूं ?

जरा तनहा बैठ और सोच
तू ही गलत होता है कयूं ?

मुकेष इलाहाबादी ........

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