रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है

रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है
फिर क्यूँ आब को तरसता है

गर चाँद नहीं है तेरी आँखों में
इस झील में कौन लरज़ता है

तू कहती है मुझसे प्यार नहीं
फिर सीने में कौन धड़कता है

किसकी यादें फलक पे टंगी है
सितारे सा शब भर चमकता हैं

मुद्दतें हुई तुझको गए हुए पर
ये दिल तेरे लिए ही ठुनकता है

मुकेश इलाहाबादी ------------

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