मन के आँगन में

अपने
मन के आँगन में
सफ़ेद चौकोर पत्थरों के बीच
थोड़ी कच्ची ज़मीन छोड़ रखना
देखना एक दिन मै उगूँगा
रजनीगंधा सा और महकूँगा
तुम्हारी साँसों में

मुकेश इलाहाबादी ------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है