मेरी ठिठोली पे

मेरी
ठिठोली पे
तुम्हारा 'धत्त' कह के भाग जाना
जैसे,
महुआ चू पड़ा हो
वीरान तपती दोपहरिया में

मुकेश इलाहाबादी -----------

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