शुबो रोशनदान तक आती धू

शुबो रोशनदान तक आती धूप
जाने क्या सोच लौट गयी धूप

इंद्रधनुष का आँचल सतरंगी
देखो कित्ती प्यारी लगती धूप

जाड़े में जब कोहरे में से झांके
सब को अच्छी लगती है धूप

है सुबह मुस्काती दोपहर,चुप
सांझ छत पे गुनगुनाती धूप

जब जब तू सज कर निकले
तेरे चेहरे पे खिलती है धूप

मुकेश इलाहाबादी -------------

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