किसी गर्मी की


किसी
गर्मी की
ऊँघती दोपहर में ही
आ जाओ छाँव बन के
फिर सो जाऊँ मै
तुमको ओढ़ कर

निचिंत - खुश - खुश


किसी
जाड़े की सुबह सुबह
आ जाओ गुनगुनी धूप सा
दिन भर बैठा रहूँ छत पे
बदन सेंकता हुआ

मुकेश इलाहाबादी ---------

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