दंतकथाओं सा

चाह
के भी तुम्हारी यादों को
नहीं मिटा पाता हूँ अपने ज़ेहन से
वे बरसों बाद आज भी ज़िंदा हैं
दंतकथाओं सा मेरी स्मृतियों में
और रहेंगी
न जाने कब तक

मुकेश इलाहाबादी ---------------

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