और रात करवट बदलते बीत जाती है

सुबह
की ताज़ी हवा मुझे
इंसान की तरह जगाती है

किन्तु
कुछ देर बाद 'मै'
अपने अंदर के इंसान को मार के
कुत्ते की खाल ओढ़ कर
ऑफिस चल देता हूँ
दिन भर अपने अधीनस्थों पे
भौंकने, बॉस के आगे दुम हिलाने के बाद
सांझ हाँफता हुआ घर लौटता हूँ

रात कुत्ते की खाल उतार
भेड़िया बन जाता हूँ
बिस्तर पे मेमने का शिकार करने के लिए

नींद में फिर इंसान बनना चाहता हूँ
पर निगोड़े सपने बनने नहीं देते
और रात करवट बदलते बीत जाती है

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

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