संग तराश



संग तराश
तुम्हे क्या पता ?
पत्थर के अंदर एक
ठस और बेजान मूर्ति भर नहीं थी
जिसे तुमने अपनी छेनी हथौड़ी से तराशा है
इस पत्थर के अंदर
एक झरना भी था
जो फूटना और बहना चाहता था
एक मोम की गुड़िया भी थी
जो धीमी -धीमी आँच में
पिघलना चाहती थी
और रोशनी भी देना चाहती थी
खैर ! तुम पत्थर की देवी से खुश हो तो खुश रहो
ओ ! मेरे संग तराश

मुकेश इलाहाबादी -----------------





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