सुर्ख गालों, आबनूशी गेसू ऑ,

बैठे ठाले की तरंग -------
सुर्ख गालों, आबनूशी  गेसू ऑ,
बसन्ती दामन से लिपट आया,
यूँ मै बहारों से गले मिल आया 
       -------  मुकेश इलाहाबादी

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है