गुलों का खिलना न हुआ

गुलों का खिलना न हुआ
मौसम खुशनुमा न हुआ
वह ग़ैर था ग़ैर ही रहा
मेरा वह अपना न हुआ
चिलमन से झांकता रहा
रू ब रू सामना न हुआ
रात हो गयी अभी तक
चाँद का उगना न हुआ
हम मिश्रा ऐ सानी रहे
मिश्रा ऐ ऊला न मिला

मुकेश इलाहाबादी ----

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है