बादलों की ज़मीं पे ग़ज़ल लिख दिया
बादलों की ज़मीं पे ग़ज़ल लिख दिया
यूँ कि चाँद को हमने ख़त लिख दिया
साँसों में बेला, चमेली, रात रानी झरे
नाम हमने उसका महक लिख दिया
झील सी आखों में खिलखिलाती हंसी
उस फूल को हमने कँवल लिख दिया
रूई के फाॉहों से उजले उजले आरिज़
गालों पे उसके मुहब्बत लिख दिया
मुद्दत हुई हमसे बोलता नहीं मुकेश
अब तो उसे बेवफा सनम लिख दिया
यूँ कि चाँद को हमने ख़त लिख दिया
साँसों में बेला, चमेली, रात रानी झरे
नाम हमने उसका महक लिख दिया
झील सी आखों में खिलखिलाती हंसी
उस फूल को हमने कँवल लिख दिया
रूई के फाॉहों से उजले उजले आरिज़
गालों पे उसके मुहब्बत लिख दिया
मुद्दत हुई हमसे बोलता नहीं मुकेश
अब तो उसे बेवफा सनम लिख दिया
मुकेश इलाहाबादी -------------------
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