लब पे सजा लो तो तराना हूँ मै,

लब पे सजा लो तो तराना हूँ मै,
वरना एक पागल दीवाना हूँ मै

हर गली कूचे मे है किस्सा मेरा
शहर के लिये इक फ़साना हूँ मै

रोज़ मिलते हैं मुलाक़ात होती है
फिर भी उसके लिये बेगाना हूँ मै

वक़्त के सांचे मे ढलना न आया
तभी तो बीता हुआ ज़माना हूँ मै

मर्ज़ी है तुम्हारी चाहे जो कह लो
आदतों से फ़क़ीर सूफियाना हूँ मै


मुकेश इलाहाबादी -----------------

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