ये अलग बात कि हम हथेली पे सूरज उगाये बैठे हैं




ये अलग बात कि हम हथेली पे सूरज उगाये बैठे हैं
मगर आपके लिए तो जुल्फों की छांह सजाये बैठे हैं
औरत हो  के तो हमेसा जलना हमारा मुक़द्दर ठहरा
पर हर बार हमी  आपके  लिए  पलकें बिछाए बैठे हैं







मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------- 

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