गर आँचल से वक़्त की गर्द पोंछ दी होती


बैठे ठाले की तरंग ----------------------

गर आँचल से वक़्त की गर्द पोंछ दी होती
तस्वीर हमारी फिर से  निखर  गयी होती

यूँ वक़्त से पहले चरागे मुहब्बत न बुझता
गर आँचल से ज़माने को यूँ हवा न दी होती

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

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