चाँद मुस्कुराता है,, खामोश दरिया बुलाता है ,,,




चाँद मुस्कुराता है,,
खामोश दरिया बुलाता है ,,,
मै .... अपने ज़ख्मो को देखता हूँ
फिर --
न जाने क्या सोच,
लंगडाते हुए
दरिया में डूब जाता हूँ
दरिया कुनमुना कर
एक बार फिर चुप हो जाता है
उधर,,,,,,,,,, चांदनी भी .........
धीरे ------ धीरे ---------
बादलों की ओट में डूब जाती  है
अब चांदनी  और मै दोनों
डूब चुके हैं
खामोश दरिया में
खामोशी के साथ
उधर ---------
सितारे भी ,
टिमटिमाकर
छुप गए हैं
न जाने किस
अँधेरे जंगल में
और ---------
अब ,,,,,,,,,
चारों तरफ
भयावह सन्नाटे के साथ
सनसनाता हुआ
कायनात बच रहा है
बस ---------------

मुकेश इलाहाबादी

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