रात भर बहुत तड़पा, मन
रात भर बहुत तड़पा, मन
तुम बिन बहुत अकेला,मन
इक दिन, तुम लौट आओगे
क्यूँ ये बार-बार कहता मन
जेठ - बैसाख से तपते दिन
सावन भादों सा बरसा मन
तुम मगन थे अपनी धुन में
तुमने मेरा कब समझा मन
गैरों में ही उलझे थे तुम पर
तुम सिर्फ मेरे हो कहता मन
मुकेश इलाहाबादी ------------
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