तुम्हारी तरह खूबसूरत कविता लिखना चाहा

एक
दिन मैंने
तुम्हारी तरह खूबसूरत
कविता लिखना चाहा
शब्द कोष से ढूंढ ढूंढ ढेर सारे
अच्छे अच्छे शब्दों को भावों में पिरोया
कई नामवर कवियों  भावों को भी अपनी
कविता में पिरोया फिर प्रेम से
अपनी कविता को निहारा
तुम्हारी तस्वीर को निहारा
देर तक देखता रहा
लगा मेरी कविता तुम्हारी तस्वीर से फीकी है
मैंने उस कविता को फाड़ा और
फिर से पूरी तन्मयता से एक और प्यारी सी
कविता लिखी और फिर तुम्हारी पिक से तुलना की
पर इस बार  कविता तुम्हारी पिक से कमतर रही

बाद इसके कई कोशिशों के मै हारता ही रहा
नहीं लिख पाया एक बेहे पंक्ति तुम्हारी पिक सा

शायद तुम इतनी प्यारी हो जिसे दुनिया के
कोइ भी शब्द अपने अंदर नहीं समाहित कर पाएंगे

लिहाज़ा अब मै जान गया हूँ
तुमसे खूबसूरत कोइ कविता नहीं है - दुनिया में
जीती जगती - हँसती'- गुनगुनाती -
थोड़ी नखरीली और चटकीली

क्यूँ सच कह रहा हूँ न ???
बोलो न ????

मुकेश इलाहाबादी --------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है