विडंबना ही तो है,

विडंबना ही तो है,
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अनाज
से एक - एक कंकर,
पत्थर बीन कर अलग करने वाली औरत
ज़िदंगी भर नहीं पहचान पाती
या अलग कर पाती है
अपनी ज़िंदगी में आये कंकर पत्थर

मुकेश इलाहाबादी ---------

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