आसमान से उतर के फरिस्ते देखते हैं

आसमान से उतर के फरिस्ते देखते हैं
बादल भी तुझको थम थम के देखते हैं
उफ! खु़दा की ऐसी जल्वानिगारी है तू
देखने वाले तुझे जी भर भर के देखते हैं
तेरे बैगनी बोगन बेलिया से आंचल में
हम बिखरे बिखरे चॉद सितारे देखते हैं
सजसंवर के जब भी तू निकले है घर से
तुझे क्या मालूम हम छुप छुप के देखते हैं
मुसाफिर ही नही कारवां तक रुक जाते हैं
सडकों पे रहागीर तुझे मुड मुड के देखते हैं
हक़ीकत में तो ये मुमकिन नही लिहाजा
रोज शबभर ख्वाबों में हम तुझे देखते हैं
मुकेश इलाहाबादी -----------------------

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