सुबह से जो छत पे मुस्कुरा रही थी धूप

सुबह से जो छत पे मुस्कुरा रही थी धूप
साँझ होते ही उदास हो उतर गयी धूप
जब तक पिता थे सर पे घना साया था
बाद उसके ज़िंदगी गर्म दोपहर की धूप
सर्द मौसम में देती हैं अजब सी गर्मी
इसी लिए सेंकता हूँ तेरी यादों की धूप

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

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