कई बार जी चाहता है तुम्हारे साथ बैठूँ ,

कई बार
जी चाहता है
तुम्हारे साथ बैठूँ ,
बात करूँ देर तक
अपनी - तुम्हारी,
दुनिया जहान की
फिर, याद आती हैं,
बहुत सारी बातें
और फिर,
मुल्तवी कर देता हूँ
तुम्हारे साथ बैठ के
बतियाने का इरादा

मुकेश इलाहाबादी -------

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