बाग़ की हवाएं चुगली कर रही है

बाग़ की हवाएं चुगली कर रही है
कली भौरें से कुछ तो कह रही है

आओ चलें दूर तक बहें चलें हम 
रात  इश्क़ की नदी सा बह रही है

आ तेरी बिखरी लटों को संवार दूँ
खुली हुई ज़ुल्फ़ें तंग कर रही है

मेरे सीने पे सर रख के सुनो तो
क़ी मेरी धधकन क्या कह रही है 

खाक होने के पहले आ के मिल
मेरे अंदर इक आग जल रही है

मुकेश इलाहाबादी -----------------

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