हँसी

 वो 

उधर से 

हँसी उछाल देती है 


मै,

इधर से एक बित्ता 

मुस्कान, लुढ़का देता हूँ 


फिर मै उसकी हँसी के 

छोटे - छोटे गोले बना उछाल देता हूँ 

जो सांझ की नीले - नीले आकाश में 

रात होते ही सितारे सा चमकने हैं 

मेरे आँगन में 


और वो मेरी मुस्कराहट को 

खोंस लेती है अपने बालों में 

हेयर बैंड की तरह 

और रात 

उसी मुस्कराहट के कुछ हिस्सों की 

तकिया बना खो जाती है 

मीठे सपनो में 


और मै देखता हूँ 

उसकी उजली - उजली हँसी के 

सितारों से भरे आकाश को 


मुकेश इलाहाबादी -------------



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